राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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होती है। जिन सब वासनाओ के प्रकाशित होने की उपयुक्त अवस्था आती है, उस समय केवल वे ही प्रकाशित होगी। शेष सब संचित रहेगी। इस जीवन मे हमारी बहुतसी देवोचित वासनाएँ है, बहुतसी मनुष्योचित और बहुतसी पाशविक। जब हम देव-देह धारण करते है, तो केवल शुभ वासनाएँ ही प्रकाशित होती हैं, क्योकि तब उनके प्रकाशित होने का उपयुक्त अवसर आता है। जब हम पशु-देह धारण करते है, तो केवल पाशविक वासनाएँ ही ऊपर आती है और शुभ वासनाएँ बाट देखती रहती हैं। इससे क्या पता चलता है ? यही कि बाहर मे उपयुक्त अवस्था होने पर इन वासनाओ का दमन किया जा सकता है। जो कर्म उस अवस्था के उपयुक्त और अनुकूल हैं, केवल वे ही प्रकाशित होगे। इससे यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है कि वातावरण की शक्ति कर्म का भी दमन कर सकती है।
जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेक-
रूपत्वात् ॥९॥
**सूत्रार्थ—**स्मृति और सस्कार एकरूप होने के कारण, जाति, देश और काल का व्यवधान रहने पर भी, वासनाओं (कर्म-सस्कारो) का आनन्तर्य रहता है अर्थात् उनमें व्यवधान नहीं होता।
**व्याख्या—**समस्त अनुभूतियाँ सूक्ष्म आकार धारण कर सस्कार के रूप मे परिणत हो जाती हैं। जब वे सस्कार फिर से जागृत होते है, तब उसी को स्मृति कहते हैं। ज्ञानपूर्वक किए गए वर्तमान कर्म के साथ, सस्कार के रूप मे परिणत पूर्व-अनुभूतियो का जो परस्पर अज्ञानयुक्त सम्बन्ध है, यहाँ पर उसका भी 'स्मृति' शब्द से बोध होता है। प्रत्येक देह में वही संस्कार-समष्टि कर्म का कारण होती है, जो उसी जाति की