राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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को जीता है, उन्होने अपने मन को ही नही, वरन् सबके मन को भी जीत लिया है। उन्होने अपनी देह और दूसरी जितनी देह हैं, सबको अपने अधीन कर लिया है, क्योकि प्राण ही सारी शक्तियो का मूल है।
किस प्रकार इस प्राण पर विजय पाई जाय, यही प्राणायाम का एकमात्र उद्देश्य है। इस प्राणायाम के सम्बन्ध में जितनी साधनाएँ और उपदेश हैं, सबका यही एक उद्देश्य है। हर एक साधनार्थी को, उसके सबसे समीप जो कुछ है, उसी से साधना शुरू करनी चाहिए—उसके निकट जो कुछ है, उस सब पर विजय पाने की चेष्टा करनी चाहिए। ससार की सारी वस्तुओ मे देह हमारे सबसे निकट है, मन उससे भी निकटतर है। जो प्राण ससार मे सर्वत्र क्रीडा कर रहा है, उसका जो अश इस शरीर और मन को चलाता है, वही अश हमारे सबसे निकट है। यह जो क्षुद्र प्राण-तरग है—जो हमारी शारीरिक और मानसिक शक्तियो के रूप से परिचित है, वह अनन्त प्राण-समुद्र में हमारे सबसे पास की तरग है। यदि हम उस क्षुद्र तरग पर विजय पा ले, तभी हम समस्त प्राण-समुद्र को जीतने की आशा कर सकते हैं। जो योगी इस विषय मे कृतकार्य होते हैं, वे सिद्धि पा लेते हैं, तब कोई भी शक्ति उन पर प्रभुत्व नही जमा सकती। वे एक प्रकार से सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हो जाते हैं। हम सभी देशो मे ऐसे सम्प्रदाय देखते है, जो किसी-न-किसी उपाय से इस प्राण पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा कर रहे है। इसी देश मे (अमेरिका में) हम मन शक्ति से आरोग्य करनेवाले (Mind-healers), विश्वास से आरोग्य करनेवाले (Faith-healers), प्रेततत्त्ववित् (Spiritualists), ईसाई