राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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'क्रिश्चियनवित् (Christian Scientists)*, वशीकरणविद्यावित् (Hypnotists), आदि अनेक सम्प्रदाय देखते है। यदि हम इन मतो का विशेष रूप से विश्लेषण करे, तो देखेंगे कि इन सब मतो के मूल मे—वे फिर जाने या न जाने—प्राणायाम ही है। उन सब मतो के मूल मे एक ही बात है। वे सब एक ही शक्ति को लेकर कार्य कर रहे हैं, पर हाँ, वे उसके सम्बन्ध मे कुछ जानते नही। उन लोगो ने एकाएक मानो एक शक्ति का आविष्कार कर डाला है, परन्तु उस शक्ति के स्वरूप के सम्बन्ध में बिलकुल अनभिज्ञ है। योगी जिस शक्ति का परिचालन करते है, ये भी बिना जाने-बूझे उसी का परिचालन कर रहे है। वह प्राण की ही शक्ति है।
यह प्राण ही समस्त प्राणियो के भीतर जीवनी-शक्ति के रूप मे विद्यमान है। मनोवृत्ति इसकी सूक्ष्मतम और उच्चतम अभिव्यक्ति है। जिसे हम साधारणत मनोवृत्ति की आख्या देते है, मनोवृत्ति कहने से केवल उसका बोध नही होता। मनो-वृत्ति के अनेक प्रकार हैं। जिसे हम सहज ज्ञान (instinct) अथवा ज्ञानरहित चित्त-वृत्ति अथवा मन की अचेतन भूमि कहते हैं, वह हमारा निम्नतम कार्यक्षेत्र है। मान लो, मुझे एक मच्छड़ ने काटा, तो मेरा हाथ अपने ही आप उसे मारने को उठ जाता है। उसे मारने के लिए हाथ को उठाते-गिराते मुझे कोई विशेष सोच-विचार नही करना पड़ता। यह एक प्रकार की मनोवृत्ति है। शरीर की समस्त ज्ञानरहित प्रतिक्रियाएँ
* टिप्पणी के लिए पृष्ठ २५ देखिए।