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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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४२ राजयोग

(reflex actions*) इसी श्रेणी की मनोवृत्ति के अन्तर्गत है।* इससे ऊँची एक दूसरी श्रेणी की मनोवृत्ति है, उसे सज्ञान मनोवृत्ति अथवा मन की चेतन भूमि कहते है। हम युक्ति-तर्क करते है, विचार करते है, सब विषयो के दोनो पहलू सोचते है। परन्तु इतने से ही समस्त मनोवृत्तियो की समाप्ति नही हो जाती। हमे मालूम है, युक्ति या विचार बिल्कुल छोटीसी सीमा के अन्दर विचरण करता है। वह हम लोगो को कुछ ही दूर तक ले जा सकता है, इसके आगे उसका और अधिकार नही। जितनी जगह के अन्दर वह चक्कर काटता है, वह बहुत छोटी, बहुत सकीर्ण है। परन्तु हम यह भी देख रहे है कि बहुत से विषय, जो उसके अधिकार के बाहर है, उसके भीतर आ रहे है। पुच्छल तारा जिस प्रकार सौर-जगत् के अधिकार के भीतर न होने पर भी कभी-कभी उसके भीतर आ जाता है और हमे दीख पडता है, उसी प्रकार बहुत से तत्त्व, हमारी युक्ति के अधिकार के बाहर होने पर भी, उसके भीतर आ जाते है। यह अवश्य है कि वे सब तत्त्व इस सीमा के बाहर से आते है, पर विचार-शक्ति इस सीमा को पार नही कर सकती। इस छोटीसी सीमा के भीतर उनके इस अनधिकार प्रवेश का कारण यदि हम खोजना चाहे, तो हमें अवश्य इस सीमा के बाहर जाना होगा। हमारे विचार, हमारी युक्तियाँ वहाँ नही पहुँच सकती। योगियो का कहना है कि यह सज्ञान या चेतन भूमि ही हमारे ज्ञान की चरम सीमा नही है। मन तो पूर्वोक्त दोनो भूमियो से भी उच्चतर भूमि पर विचरण


* बाहर की किसी प्रकार की उत्तेजना से शरीर का कोई यन्त्र, समय-समय पर, ज्ञान की सहायता लिए बिना अपने आप जब काम करता है, तो उस कार्य को reflex action कहते है।