राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 56 of 307
Read in contextप्राण ४३
कर सकता है। उस भूमि को हम ज्ञानातीत या पूर्णचेतन भूमि कहते हैं—वही समाधि नामक पूर्ण एकाग्र अवस्था है। जब मन उस अवस्था में उपनीत होता है, तब वह युक्ति-राज्य के परे चला जाता है तथा सहज ज्ञान और युक्ति के अतीत विषयों को प्रत्यक्ष करता है। शरीर की सारी सूक्ष्म से सूक्ष्म शक्तियाँ, जो प्राण की ही विभिन्न अवस्था मात्र हैं, यदि सही रास्ते से परिचालित हों, तो वे मन पर विशेष रूप से कार्य करती हैं, और तब मन भी पहले से ऊँची अवस्था में अर्थात् ज्ञानातीत या पूर्णचेतन भूमि में चला जाता है और वहाँ से कार्य करता रहता है।
बहिर्जगत् हो अथवा अन्तर्जगत्, जिधर भी दृष्टि दौड़ाई जाय, उधर ही एक अखण्ड वस्तुराशि दीख पड़ती है। भौतिक संसार की ओर दृष्टिपात करने पर दिखता है कि एक अखण्ड वस्तु ही मानो नाना रूपों में विराजमान है। वास्तव में, तुममें और सूर्य में कोई भेद नहीं। वैज्ञानिक के पास जाओ, वे तुम्हें समझा देंगे कि वस्तु-वस्तु में भेद केवल काल्पनिक है। इस टेबुल से वास्तव में मेरा कोई भेद नहीं। यह टेबुल अनन्त जड़राशि की मानो एक बूँद है और मैं उसी की एक दूसरी बूँद। प्रत्येक साकार वस्तु इस अनन्त जड़-सागर में मानो एक भँवर है। भँवर सारे समय एकरूप नहीं रहते। मान लो, किसी नदी में लाखों भँवर हैं, प्रत्येक भँवर में प्रति क्षण नई जलराशि आती है, कुछ देर घूमती है और फिर दूसरी ओर चली जाती है। उसके स्थान में एक नई जलराशि आ जाती है। यह जगत् भी इसी प्रकार सतत परिवर्तनशील एक जड़राशि मात्र है और ये सारे रूप उसके भीतर मानो छोटे-छोटे भँवर हैं। कोई भूत-समष्टि किसी मनुष्य-देहरूपी भँवर में घुसती है, और वहाँ कुछ