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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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प्राण ४५.

जगत् भावराशि की समष्टि मात्र है।' कुछ समय के लिए सारे स्थूल कम्पन (gross vibrations) चले गए थे और केवल सूक्ष्म कम्पन, जिनको उन्होने भावराशि कहा था, बच रहे थे। उन्होने चारो ओर केवल सूक्ष्म कम्पन देखे थे। सम्पूर्ण जगत् उनकी आँखो मे मानो एक महान् भाव-समुद्र मे परिणत हो गया था। उस महासमुद्र मे वे और जगत् की प्रत्येक व्यष्टि मानो एक-एक छोटा भाव-भँवर बन गई थी।

इस प्रकार हम देखते है कि अन्तर्जगत् मे भी एक अखण्ड भाव विद्यमान है। और अन्त मे जब हम वाह्य, अन्तर—सम्पूर्ण जगत् को छोडकर उस आत्मा के समीप जाते है तब वहाँ एक अखण्ड के अतिरिक्त और कुछ नही अनुभव करते। स्थूल और सूक्ष्म सब प्रकार की गतियो के पीछे वही एक अखण्ड सत्ता अपनी महिमा में विराजमान है। यहाँ तक कि इन परिदृश्यमान गतियो के भीतर भी—शक्ति की स्थूल अभिव्यक्तियो के भीतर भी—केवल एक अखण्ड भाव विद्यमान है। इन सत्यो को अब अस्वीकार नही किया जा सकता, क्योकि ये सब विज्ञान द्वारा प्रमाणित हो चुके है। आधुनिक पदार्थविज्ञान ने यह प्रमाणित कर दिया है कि शक्ति-समष्टि सर्वत्र समान है और यह भी सिद्ध हो चुका है कि यह शक्ति-समष्टि दो तरह से अवस्थित है—कभी स्तिमित या अव्यक्त अवस्था मे और कभी व्यक्त अवस्था मे। व्यक्त अवस्था में वह इन नानाविध शक्तियो के रूप धारण करती है। इस प्रकार वह अनन्त काल से कभी व्यक्त और कभी अव्यक्त भाव धारण करती आ रही है। इस शक्तिरूपी प्राण के सयम का नाम ही प्राणायाम है।

इस प्राणायाम के साथ श्वास-प्रश्वास की क्रिया का सम्बन्ध