राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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बहुत थोडा है। यथार्थ प्राणायाम का अधिकारी होने मे यह श्वास प्रश्वास की क्रिया एक उपाय मात्र है। मनुष्य-देह मे प्राण का सबसे स्पष्ट प्रकाश है—फेफडे की गति। यदि यह गति रुक जाय, तो देह की सारी क्रियाएँ तुरन्त बन्द हो जायेंगी, शरीर के भीतर जो अन्यान्य शक्तियाँ कार्य कर रही थी, वे भी शान्त भाव धारण कर लेगी। पर ऐसे भी व्यक्ति हैं, जो अपने को इस प्रकार शिक्षित कर लेते हैं कि उनके फेफडे की गति रुक जाने पर भी उनका शरीर नही जाता। ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं, जो बिना सांस लिए कई महीने तक जमीन के अन्दर गडे रह सकते हैं, पर तो भी उनका देह-नाश नही होता। सूक्ष्मतर शक्ति के पास जाने के लिए हमें स्थूलतर शक्ति की सहायता लेनी पडती है। इस प्रकार क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर शक्ति मे जाते हुए अन्त में हम चरम लक्ष्य पर पहुँच जाते है। शरीर मे जितने प्रकार की क्रियाएँ है, उनमे फेफडे की क्रिया ही सबसे सहज रूप से प्रत्यक्ष है। वह मानो देह के भीतर गतिनियामक चक्र के रूप मे अन्य सब शक्तियो को चला रही है। प्राणायाम का यथार्थ अर्थ है—फेफड़े की इस गति का रोध करना। इस गति के साथ श्वास का निकट सम्बन्ध है। यह गति श्वास-प्रश्वास द्वारा उत्पन्न नहीं होती, वरन् वही श्वास-प्रश्वास की गति को उत्पन्न कर रही है। यह गति ही, पम्प की भाँति, वायु को भीतर खीचती है। प्राण इस फेफडे को चलाता है और फेफडे की यह गति फिर वायु को खींचती है। इस तरह यह स्पष्ट है कि प्राणायाम श्वास-प्रश्वास की क्रिया नही है। पेशियो की जो शक्ति फेफड़े को चलाती है, उसको वश मे लाना ही प्राणायाम है। जो शक्ति स्नायुओं के भीतर से मांसपेशियो के पास जाती है और जो फेफड़े का