राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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संचालन करती है, वही प्राण है। प्राणायाम की साधना मे हमे उसी को वश मे लाना है। जब प्राण पर विजय प्राप्त हो जायगी, तब हम देखेंगे कि शरीरस्थ प्राण की अन्यान्य सभी क्रियाएँ हमारे अधिकार मे आ गई है। मैने स्वय ऐसे व्यक्ति देखे है, जिन्होने अपने शरीर की सारी पेशियो को वंशीभूत कर लिया है अर्थात् वे उनको इच्छानुसार चला सकते है। और वे ऐसा कर भी क्यो न सकेगे ? यदि कुछ पेशियाँ हमारी इच्छा के अनुसार चलाई जा सकती हो, तो दूसरी सब पेशियो और स्नायुओ को हम इच्छानुसार क्यो न चला सकेगे ? इसमे असम्भव क्या है ? कभी हमारी इस सयम-शक्ति का लोप हो गया है, और वे पेशियाँ इच्छानुग न हो स्वैर हो गई हैं। हम इच्छानुसार कानो को नही हिला सकते, परन्तु हम जानते है कि पशुओ मे यह शक्ति है। हममे यह शक्ति इसलिए नही है कि हम इसे काम मे नही लाते। इसी को क्रम-अवनति अथवा पूर्वावस्था की ओर पुनरावर्तन (atavism) कहते है।
फिर, हम यह भी जानते है कि जिस शक्ति ने अभी अव्यक्त भाव धारण किया है, उसे हम फिर से व्यक्तावस्था में ला सकते हैं। दृढ अभ्यास के द्वारा शरीर की अनेक क्रियाएँ, जो अभी हमारी इच्छा के अधीन नही, फिर से पूरी तरह वश मे लाई जा सकती है। इस प्रकार विचार करने पर दीख पडता है कि शरीर का प्रत्येक अश हम पूरी तरह अपनी इच्छा के अधीन कर सकते हैं, इसमें कुछ भी असम्भव नही, बल्कि यह तो पूर्णरूपेण सम्भव है। योगी प्राणायाम द्वारा इसमे कृतकार्य होते हैं। तुम लोगो ने योगशास्त्र के बहुत से ग्रन्थो मे लिखा देखा होगा कि श्वास लेने के समय सम्पूर्ण शरीर को प्राण से पूर्ण