राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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उत्तम रूप से होता है। एक और दूसरे प्रकार की भी आरोग्य-प्रणाली है, जिसमें आरोग्यकारी स्वयं बहुत स्वस्थकाय न होने पर भी दूसरे के शरीर मे स्वास्थ्य का संचार कर दे सकता है। इन स्थलो में उस आरोग्यकारी व्यक्ति को कुछ परिमाण में प्राणजयी समझना चाहिए। वह कुछ समय के लिए अपने प्राण मे मानो एक विशेष कम्पन उत्पन्न करके दूसरे के शरीर में उसका सञ्चार कर देता है।
अनेक स्थलो मे यह कार्य बहुत दूरसे भी साधित हुआ है। यदि सचमुच में दूरत्व का अर्थ क्रमविच्छेद ( Break ) हो, तो दूरत्व नामक कोई चीज नही। ऐसा दूरत्व कहाँ है, जहाँ परस्पर कुछ भी सम्बन्ध, कुछ भी योग नही ? सूर्य मे और तुममें क्या वास्तविक कोई क्रमविच्छेद है ? नही, यह तो समस्त एक अविच्छिन्न अखण्ड वस्तु है, तुम उसके एक अश हो और सूर्य उसका एक दूसरा अश। नदी के एक भाग और दूसरे भाग मे क्या क्रम-विच्छेद है ? तो फिर शक्ति भी एक जगह से दूसरी जगह क्यों न भ्रमण कर सकेगी ? इसके विरोध मे तो कोई युक्ति नही दी जा सकती। दूर से आरोग्य करने की घटनाएँ बिलकुल सत्य हैं। इस प्राण को बहुत दूर तक सचालित किया जा सकता है। पर हाँ, इसमे धोखेबाजी बहुत है। यदि इसमे एक घटना सत्य हो, तो अन्य सैकड़ो असत्य और छल-कपट के अतिरिक्त और कुछ नही। लोग इसे जितना सहज समझते है, यह उतना सहज नही। अधिकतर स्थलो में तो देखोगे कि आरोग्य करनेवाले चगा करने के लिए मानव-देह की स्वाभाविक स्वस्थता की ही सहायता लेते हैं। एक ऐलोपैथ चिकित्सक आता है, हैजे के रोगियो की चिकित्सा करता है और उन्हे दवा देता है; एक होमियोपैथ चिकित्सक
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