राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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आता है, वह भी रोगियो को अपनी दवा देता है और शायद लोपैथ की अपेक्षा अधिक रोगियो को चगा कर देता है। ऐसा क्यो? इसलिए कि वह रोगी के शरीर मे किसी तरह का विपर्यय न लाकर प्रकृति को अपनी चाल से काम करने देता है। और विश्वास के बल से आरोग्य करनेवाला तो और भी अधिक रोगियो को चगा कर देता है, क्योकि वह अपनी इच्छाशक्ति द्वारा कार्य करके विश्वास-बल से रोगी की प्रसुप्त प्राण-शक्ति को प्रबुद्ध कर देता है।
परन्तु विश्वास-बल से रोगो को अच्छा करनेवालो को सदा एक भ्रम हुआ करता है, वे सोचते है कि साक्षात् विश्वास ही लोगो को रोगमुक्त करता है। वास्तव मे यह नही कहा जा सकता कि केवल विश्वास इसका कारण है। ऐसे भी रोग है, जिसमें रोगी स्वय नही समझ पाता कि उसके कोई रोग है। रोगी का अपनी नीरोगता पर अतीव विश्वास ही रोग का एक प्रधान लक्षण है, और इससे आसन्नमृत्यु की सूचना होती है। इन सब स्थलो मे केवल विश्वास से रोग नही टलता। यदि विश्वास ही रोग की जड काटता हो, तो वे रोगी मौत के मुँह न गए होते। वास्तव में रोग तो इस प्राण की शक्ति से ही दूर होता है। प्राण-जित् पवित्रात्मा पुरुष अपने प्राण को एक निर्दिष्ट कम्पन मे ले जा सकते है और उसे दूसरे मे सञ्चारित करके, उसके भीतर भी उसी प्रकार का कम्पन पैदा कर सकते हैं। तुम प्रतिदिन की घटना से यह प्रमाण ले सकते हो। मै वक्तृता दे रहा हूँ। वक्तृता देते समय मै क्या कर रहा हूँ? मै अपने मन के भीतर मानो एक विशिष्ट कम्पन पैदा कर रहा हूँ। और मै इस विषय में जितना ही कृतकार्य होऊँगा, तुम मेरी बात सुनकर उतने ही प्रभावित