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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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५६ राजयोग

स्पन्दन-क्षेत्र को एक वृत्त के रूप मे सोचो, सिद्धि उसका केन्द्र है, इस केन्द्र से हम जितनी दूर जायेंगे, स्पन्दन उतना ही मृदु होता जायगा। भूत सबसे बाहरी स्तर है, मन उससे निकटवर्ती, और आत्मा मानो केन्द्रस्वरूप है। इस प्रकार विचार करने से हम देखेंगे कि जो प्राणी एक स्तर पर वास करते है, वे एक दूसरे को पहिचान सकेगे, परन्तु अपने से नीचे या ऊँचे स्तरवाले जीवों को न पहिचान सकेंगे। फिर भी, जैसे हम अणुवीक्षण यंत्र और दूरवीन की सहायता से अपनी दृष्टि का क्षेत्र वढा सकते है, उसी प्रकार मन को विभिन्न प्रकार के स्पन्दनों से युक्त करके हम दूसरे स्तर का समाचार अर्थात् वहाँ क्या हो रहा है यह जान सकते है। समझो, इसी कमरे मे ऐसे बहुत से प्राणी हैं, जिन्हे हम नही देख पाते। वे सब प्राण के एक प्रकार के स्पन्दन के फल हैं, और हम एक दूसरे प्रकार के। मान लो कि वे प्राण के अधिक स्पन्दन से युक्त हैं और हम उनकी तुलना मे कम स्पन्दन से। हम भी प्राणरूप मूल वस्तु से गढे हुए है, और वे भी वही है। सभी एक ही समुद्र के भिन्न-भिन्न अंश मात्र हैं। विभिन्नता है केवल स्पन्दन की मात्रा मे। यदि मन को मैं अधिक स्पन्दन-विशिष्ट कर सका, तो मै फिर इस स्तर पर न रहूँगा, मैं फिर तुम लोगो को न देख पाऊँगा। तुम मेरी दृष्टि से अन्तर्हित हो जाओगे और वे मेरी आँखो के सामने आ जायेंगे। तुममें से शायद बहुतो को मालूम है कि यह व्यापार सत्य है। मन को इस प्रकार उच्च से उच्चतर स्पन्दन-विशिष्ट करने को योगशास्त्र में एकमात्र 'समाधि' शब्द द्वारा अभिहित किया गया है। समाधि की निम्नतर अवस्थाओ मे इन अदृश्य प्राणियो को प्रत्यक्ष किया जाता है। और समाधि की सर्वोच्च