राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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अवस्या तो वह है, जब हमे सत्यस्वरूप ब्रह्म के दर्शन होते है। तब हम उस उपादान को जान लेते है, जिससे इन सब बहुविध जीवों की उत्पत्ति हुई है। जैसे एक मृत्पिण्ड को जान लेने पर समस्त मृत्पिण्ड ज्ञात हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म-दर्शन से सम्पूर्ण जगत् भी जाना जा सकता है।
इस प्रकार हम देखते है कि प्रेततत्त्व-विद्या में जो कुछ सत्य है, वह भी प्राणायाम के ही अन्तर्भूत है। इसी-प्रकार, जब कभी तुम देखो कि कोई दल या सम्प्रदाय किसी रहस्यात्मक या गुप्त तत्त्व के आविष्कार की चेष्टा कर रहा है, तो समझना, वह यथार्थत. किसी परिमाण मे इस राजयोग की ही साधना कर रहा है, प्राण-सयम की ही चेष्टा कर रहा है। जहाँ कही किसी प्रकार की असाधारण शक्ति का विकास हुआ है, वहाँ प्राण की ही शक्ति का विकास समझना चाहिए। यहाँ तक कि भौतिक विज्ञान भी प्राणायाम के अन्तर्गत किए जा सकते हैं। वाष्पीय यन्त्र को कौन संचालित करता है ? प्राण ही वाष्प के भीतर से उसको चलाता है। ये जो विद्युत् की अद्भुत क्रियाएँ दीख पडती है, ये सब प्राण के छोड भला और क्या हो सकती है ? पदार्थ-विज्ञान है क्या ? वह बाहरी उपायों द्वारा प्राणायाम है। प्राण जब मानसिक शक्ति के रूप से प्रकाशित होता है, तब मानसिक उपायो द्वारा ही उसका सयम किया जा सकता है। जिस प्राणायाम मे प्राण के स्थूल रूपो को बाह्य उपायो द्वारा जीतने की चेष्टा की जाती है, उसे पदार्थ-विज्ञान या भौतिक विज्ञान कहते है, और जिस प्राणायाम मे प्राण के मानसिक विकासो को मानसिक उपायो द्वारा सयत करने की चेष्टा की जाती है, उसी को राजयोग कहते हैं।