राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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और वहिर्मुखी शक्तिप्रवाहद्वय आना-जाना कर रहे है। परन्तु बात अब यह है कि इस प्रकार के तार के समान किसी पदार्थ की सहायता बिना मस्तिष्क से चारो ओर विभिन्न संवाद भेजना और भिन्न-भिन्न स्थानो से मस्तिष्क का विभिन्न संवाद ग्रहण करना सम्भव क्यो न होगा? प्रकृति में तो ऐसे व्यापार घटते देखे जाते हैं। योगियो का कहना है कि इसमें कृतकार्य होने पर ही भौतिक बन्धनों को लांघा जा सकता है। तो अब इसमे कृतकार्य होने का उपाय क्या है? यदि मेरुदण्डमध्यस्थ सुषुम्ना के भीतर से स्नायु-प्रवाह चलाया जा सके, तो यह समस्या मिट जायगी। मन ने ही यह स्नायु-जाल तैयार किया है, और उसी को यह जाल तोडकर किसी प्रकार की सहायता की राह न देखते हुए, अपना काम करना होगा। तभी सारा ज्ञान हमारे अधिकार मे आयगा, देह का बन्धन फिर न रह जायगा। इसीलिए सुषुम्ना नाडी पर विजय पाना हमारे लिए इतना आवश्यक है। यदि तुम इस शून्य नाली के भीतर से, स्नायु-जाल की सहायता के बिना भी मानसिक प्रवाह चला सको, तो बस इस समस्या की मीमांसा हो गई। योगी कहते हैं कि वह सम्भव है।
साधारण मनुष्यो के भीतर सुषुम्ना नीचे की ओर बन्द रहती है; उससे कोई कार्य नही होता। योगियो का कहना है कि इस सुषुम्ना का द्वार खोलकर उससे स्नायु-प्रवाह चलाने की एक निर्दिष्ट प्रणाली है। उस साधना मे सफल होने पर स्नायु-प्रवाह उसके भीतर से चलाया जा सकता है। बाह्य विषय के स्पर्श से उत्पन्न प्रवाह जब किसी केन्द्र पर पहुँचता है, तब उस केन्द्र से एक प्रतिक्रिया होती है। स्वैर केन्द्रो (automatic centres) में उन प्रतिक्रियाओ का फल केवल गति होता है, पर