राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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राजयोग
चेतनयुक्त केन्द्रो (conscious centres) में पहले अनुभव, और फिर बाद मे गति होती है। सारी अनुभूतियाँ बाहर से आई हुई क्रियाओ की प्रतिक्रिया मात्र है। तो फिर स्वप्न मे अनुभूति किस तरह होती है? उस समय तो बाहर की कोई क्रिया नही रहती। अतएव स्पष्ट है कि विषय के अभिघात से पैदा हुई स्नायविक गतिया शरीर के किसी-न-किसी स्थान पर अवश्य अव्यक्त भाव से रहती है। मान लो, मैने एक नगर देखा। "नगर" नामक बाहरी वस्तु-समूह के आघात की जो प्रतिक्रिया है, उसी से उस नगर की अनुभूति होती है। अर्थात् उस नगर के बाहरी वस्तु-समूह द्वारा हमारे अन्तर्वाही स्नायुओ मे जो गतिविशेष उत्पन्न हुई है, उससे मस्तिष्क के भीतर के परमाणुओ में एक गति पैदा हो गई है। आज बहुत दिन बाद भी वह नगर मेरी स्मृति मे आता है। इस स्मृति में भी ठीक वही व्यापार होता है, पर अपेक्षाकृत हल्के रूप मे। किन्तु जो क्रिया मस्तिष्क के भीतर उस प्रकार का मृदुतर कम्पन ला देती है, वह भला कहा से आती है? यह तो कभी नही कहा जा सकता कि वह उसी पहले के विषय-अभिघात से पैदा हुई है। अत स्पष्ट है कि विषय-अभिघात से उत्पन्न गतिप्रवाह या सवेदनाएँ शरीर के किसी स्थान पर कुण्डलीकृत होकर विद्यमान हैं और उनके अभिघात के फल से ही स्वप्न-अनुभूति रूप मृदु प्रतिक्रिया की उत्पत्ति होती हैं। जिस केन्द्र में विषय-अभिघात से उत्पन्न गतिप्रवाहों के बचे हुए अग या सस्कार-समष्टि मानो सचित-सी रहती है, उसे मूलाधार कहते हैं, और उस कुण्डलीकृत क्रियाशक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं। सम्भवत. गतिगतियो का अवशिष्ट अश भी इसी जगह कुण्डलीकृत होकर संचित है, क्योकि वाह्य