BharatKosha
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 85 of 307

Read in context
Page 85

पंचम अध्याय

अध्यात्म प्राण का संयम

अब हम प्राणायाम की विभिन्न क्रियाओ के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे। हमने पहले ही देखा है कि योगियो के मत मे साधना का पहला अंग फेफडे की गति को अपने अधीन करना है। हमारा उद्देश्य है—शरीर के भीतर जो सूक्ष्म गतियाँ हो रही हैं, उनका अनुभव प्राप्त करना। हमारा मन बिलकुल बाहर आ पडा है, वह भीतर की सूक्ष्म गतियों को बिलकुल नही पकड सकता। हम जब उनका अनुभव प्राप्त करने मे समर्थ होगे, तो उन पर विजय पा लेगे। ये स्नायविक शक्तिप्रवाह शरीर मे सर्वत्र चल रहे हैं, वे प्रत्येक पेशी मे जाकर उसको जीवन-शक्ति दे रहे हैं, किन्तु हम उनका अनुभव नही कर पाते। योगियो का कहना है कि प्रयत्न करने पर हम उनका अनुभव प्राप्त करना सीख जायेंगे। पहले फेफडे की गति पर विजय पाने की चेष्टा करनी होगी। कुछ काल तक यह कर सकने पर हम सूक्ष्मतर गतियो को भी वश मे ला सकेगे।

अब प्राणायाम की क्रियाओ की चर्चा की जाय। पहले तो, सीधे होकर बैठना होगा। देह को ठीक सीधी रखना होगा। यद्यपि मेरुमज्जा मेरुदण्ड से संलग्न नही है, फिर भी वह मेरुदण्ड के भीतर अवस्थित है। टेढा होकर बैठने से वह अस्त-व्यस्त हो जाती है। अतएव देखना होगा कि वह स्वच्छन्द भाव से रहे। टेढे बैठकर ध्यान करने की चेष्टा करने से अपनी ही हानि होती है। शरीर के तीनो भाग—वक्ष, ग्रीवा और मस्तक—सदा एक रेखा मे ठीक सीधे रखने होगे। देखोगे, बहुत थोडे अभ्यास से वह श्वास-प्रश्वास