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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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अध्यात्म प्राण का संयम ६९


की नाई सहज हो जायगा। इसके बाद स्नायुओ को वशीभूत करने का प्रयत्न करना होगा। हमने पहले ही देखा है कि जो स्नायु-केन्द्र श्वास-प्रश्वास-यन्त्र के कार्य को नियमित करता है, वह दूसरे स्नायुओ पर भी कुछ प्रभाव डालता है। इसीलिए सांस लेना और सांस छोडना ताल-बद्ध (नियमित) रूप से करना आवश्यक है। हम साधारणतः जिस प्रकार सांस लेते और छोड़ते है, वह श्वास-प्रश्वास नाम के ही योग्य नही। वह बहुत अनियमित है। फिर स्त्री-पुरुष के श्वास-प्रश्वासो मे कुछ स्वाभाविक भेद भी हैं।

प्राणायाम-साधना की पहली क्रिया यह है, — भीतर निर्दिष्ट परिमाण मे सांस लो और बाहर निर्दिष्ट परिमाण में सांस छोड़ो। इस प्रकार करने पर देह-यन्त्र का असामंजस्य-भाव दूर हो जायगा। कुछ दिन तक यह अभ्यास करने के बाद, सांस खीचने और छोड़ने के समय ओंकार अथवा अन्य किसी पवित्र शब्द का मन-ही-मन उच्चारण करने से अच्छा होगा। भारत में, प्राणायाम करते समय हम लोग श्वास के ग्रहण और त्याग की संख्या ठहराने के लिए एक, दो, तीन, चार, इस क्रम से न गिनते हुए कुछ सांकेतिक शब्दो का व्यवहार करते हैं। इसीलिए मैं तुम लोगो से प्राणायाम के समय ओंकार अथवा अन्य किसी पवित्र शब्द का व्यवहार करने के लिए कह रहा हूँ। चिन्तन करना कि वह शब्द श्वास के साथ ताल-बद्ध रूप से बाहर जा रहा है और भीतर आ रहा है। ऐसा करने पर देखोगे कि सारा शरीर क्रमशः मानो साम्यभाव धारण करता जा रहा है। तभी समझोगे, यथार्थ विश्राम क्या है। उसकी तुलना मे निद्रा तो विश्राम ही नही। एक बार यह विश्राम की अवस्था आने पर अतिशय थके