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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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षष्ठ अध्याय

प्रत्याहार और धारणा

प्राणायाम के बाद प्रत्याहार की साधना करनी पडती है। प्रत्याहार क्या है ? तुम सबो को ज्ञात है कि विषयानुभूति किस तरह होती है। सबसे पहले, देखो, इन्द्रियो के द्वार-स्वरूप ये बाहर के यन्त्र हैं। फिर हैं इन्द्रियाँ। ये इन्द्रियाँ मस्तिष्क में स्थित स्नायु-केन्द्रो की सहायता से शरीर पर कार्य करती हैं। इसके बाद है मन। जब ये समस्त एकत्र होकर किसी बाहरी वस्तु के साथ सलग्न होते हैं, तभी हम उस वस्तु का अनुभव कर सकते हैं। किन्तु मन को एकाग्र करके केवल किसी एक इन्द्रिय से सयुक्त कर रखना बहुत कठिन है, क्योकि मन (विषयो का) दास है।

हम ससार मे सर्वत्र देखते हैं, कि सभी यह शिक्षा दे रहे हैं, 'भले हो जाओ,' 'भले हो जाओ,' 'भले हो जाओ।' ससार मे शायद किसी देश मे ऐसा बालक नही पैदा हुआ, जिसे मिथ्या भाषण न करने, चोरी न करने आदि की शिक्षा नही मिली, परन्तु कोई उसे यह शिक्षा नही देता कि वह इन असत् कर्मों से किस प्रकार बचे। केवल बात करने से काम नही बनता। वह चोर क्यो न बने ? हम तो उसको चोरी से निवृत्त होने की शिक्षा नही देते, उससे बस इतना ही कह देते है, 'चोरी मत करो।' यदि उसे मन सयम का उपाय सिखाया जाय, तभी वह यथार्थ मे शिक्षा प्राप्त कर सकता है, और वही उसकी सच्ची सहायता और उपकार है। जब मन इन्द्रिय नामक भिन्न-भिन्न शक्ति-केन्द्रों में सलग्न रहता है, तभी समस्त बाह्य और आभ्यन्तरिक कर्म

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