राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextप्रत्याहार और धारणा
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होते हैं। इच्छापूर्वक अथवा अनिच्छापूर्वक मनुष्य अपने मन को भिन्न-भिन्न (इन्द्रिय नामक) केन्द्रो मे सलग्न करने को वाध्य होता है। इसीलिए मनुष्य अनेक प्रकार के दुष्कर्म करता है और वाद में कष्ट पाता है। मन यदि अपने वश में रहता, तो मनुष्य कभी अनुचित कर्म न करता। मन को सयत करने का फल क्या है? यही कि मन सयत हो जाने पर वह फिर विषयों का अनुभव करनेवाली भिन्न-भिन्न इन्द्रियो के साथ अपने को सयुक्त न करेगा। और ऐसा होने पर सब प्रकार के भाव और इच्छाएँ हमारे वश मे आ जायेंगी। यहाँ तक तो बहुत स्पष्ट है। अब प्रश्न यह है, क्या यह कार्य में परिणत होना सम्भव है? हाँ, यह सम्पूर्ण रूप से सम्भव है। तुम लोग वर्तमान समय मे भी इसका कुछ आभास देख रहे हो, विश्वास के बल से आरोग्यलाभ कराने-वाला सम्प्रदाय दुःख, कष्ट, अशुभ आदि के अस्तित्व को बिलकुल अस्वीकार कर देने की शिक्षा देता है। इसमे सन्देह नही कि इनका दर्शन बहुत-कुछ सिर के पीछे से हाथ ले जाकर नाक पकडने की तरह है, किन्तु वह भी एक प्रकार का योग है, किसी तरह उन लोगो ने उसका अविष्कार कर डाला है। जहाँ वे दुःख-कष्ट के अस्तित्व को अस्वीकार करने की शिक्षा देकर लोगो के दुःख दूर करने में सफल होते हैं, तो वहाँ समझना होगा कि उन्होने वास्तव मे प्रत्याहार की ही कुछ शिक्षा दी है, क्योकि वे उस व्यक्ति के मन को यहाँ तक सबल कर देते हैं कि वह इन्द्रियो की गवाही पर विश्वास ही नही करता। वशीकरणविद्यावाले (Hypnotists), इसी प्रकार, सूचनाशक्ति या आज्ञा (hypnotic suggestion) से कुछ देर के लिए अपने वश्य व्यक्तियो मे एक प्रकार का अस्वा-भाविक प्रत्याहार ले आते हैं। जिसे साधारणत वशीकरण-सूचना-