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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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प्रत्याहार और धारणा ७९

कार्य किया जाता है, वह भी सिद्ध नही होता। प्रत्येक जीवात्मा का चरम लक्ष्य है मुक्ति या स्वाधीनता—जडवस्तु और चित्त-वृत्ति के दासत्व से मुक्तिलाभ करके उन पर प्रभुत्व स्थापित करना, बाह्य और अन्त प्रकृति पर अधिकार जमाना। किन्तु उस दिशा में सहायता करने की बात तो अलग रही, दूसरे व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त इच्छाशक्ति का प्रवाह हम पर लगी हुई चित्तवृत्तिरूपी बन्धनो और प्राचीन कुसस्कारो की भारी बेडी में एक और कडी जोड देता है—फिर वह इच्छाशक्ति हम पर किसी भी रूप से क्यो न प्रयुक्त हो, और चाहे उससे हमारी इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष वशीभूत हो जायें, चाहे वह एक प्रकार की पीडित या विकृतावस्था में हमें इन्द्रियो को सयत करने के लिए बाध्य करे। इसलिए सावधान! दूसरे को अपने ऊपर इच्छा-शक्ति का सचालन न करने देना। अथवा दूसरे पर ऐसी इच्छाशक्ति का प्रयोग करके अनजाने उसका सत्यानाश न कर देना। यह सत्य है कि कोई-कोई लोग कुछ व्यक्तियो की प्रवृत्ति का मोड फेरकर कुछ दिनों के लिए उनका कुछ कल्याण करने मे कृतकार्य होते हैं, परन्तु साथ ही वे दूसरो पर इस वशीकरण-शक्ति का प्रयोग करके, बिना जाने, लाखो नर-नारियों को एक प्रकार से विकृत जडावस्थापन्न कर डालते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन वश्य व्यक्तियो की आत्मा का अस्तित्व तक मानो लुप्त हो जाता है। इसलिए जो कोई व्यक्ति तुमसे अन्धविश्वास करने को कहता है, अथवा अपनी श्रेष्ठतर इच्छा-शक्ति के बल से लोगो को वशीभूत करके अपना अनुसरण करने के लिए बाध्य करता है, वह मनुष्य-जाति का भारी अनिष्ट करता है—भले ही वह इसे इच्छापूर्वक न करता हो।