राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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राजयोग
अतएव अपने मन का सयम करने के लिए सदा अपने ही मन की सहायता लो, और यह सदा याद रखो कि तुम यदि रोगग्रस्त नही हो, तो कोई भी बाहरी इच्छाशक्ति तुम पर कार्य न कर सकेगी। जो व्यक्ति तुमसे अन्धे के समान विश्वास कर लेने को कहता हो, उससे दूर ही रहो, वह चाहे कितना भी बडा आदमी या साधु क्यो न हो। ससार के सभी भागो मे ऐसे बहुत से सम्प्रदाय हैं, जिनके धर्म के प्रधान अग नाच-गान, उछल-कूद, चिल्लाना आदि है। वे जब सगीत, नृत्य और प्रचार करना आरम्भ करते है, तब उनके भाव मानो सक्रामक रोग की तरह लोगो के अन्दर फैल जाते है। वे भी एक प्रकार के वशीकरण-कारी हैं। वे थोडे समय के लिए भावुक व्यक्तियो पर गजब का प्रभाव डाल देते है। पर हाय ! परिणाम यह होता है कि सारी जाति अध पतित हो जाती है। इस प्रकार की अस्वाभाविक बाहरी शक्ति के बल से किसी व्यक्ति या जाति के लिए ऊपर-ऊपर अच्छी होने की अपेक्षा अच्छी न रहना ही वेहतर है, और वह स्वास्थ्य का लक्षण है। इन धर्मोन्मत्त व्यक्तियो का उद्देश अच्छा भले ही हो, परन्तु इनको किसी उत्तरदायित्व का ज्ञान नही। इन लोगो द्वारा मनुष्य का जितना अनिष्ट होता है, उसका विचार करते ही हृदय स्तब्ध हो जाता है। वे नही जानते कि जो व्यक्ति सगीत, स्तव आदि की सहायता से—उनकी शक्ति के प्रभाव से, इस तरह एकाएक भगवद्भाव मे मत्त हो जाते है, वे अपने को केवल जड, विकृतभाववाले और शक्तिशून्य बना लेते है और सहज ही किसी भी भाव के वश में हो जाते हैं—फिर वह भाव कितना भी बुरा क्यो न हो। उसका प्रतिरोध करने की उनमें तनिक भी शक्ति नही रह जाती। इन अज्ञ, आत्मवचित व्यक्तियों