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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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प्रत्याहार और धारणा

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के मन मे यह स्वप्न मे भी नही आता कि वे एक ओर जहाँ यह कहकर हर्षोत्फुल्ल हो रहे है कि उनमे मनुष्य के हृदय को परिवर्तित कर देने की अद्भुत शक्ति है—जिस शक्ति के सम्बन्ध मे वे सोचते हैं कि वह बादल के ऊपर अवस्थित किसी पुरुष से उन्हे मिली है—वहाँ साथ ही वे भावी मानसिक अवनति, पाप, उन्मत्तता और मृत्यु के बीज भी बो रहे है । 'अतएव, जिससे तुम्हारी स्वाधीनता नष्ट होती हो, ऐसे सब प्रकार के प्रभावों से सतर्क रहो। ऐसे प्रभावो को भयानक विपत्ति से भरा जानकर प्राणपण से उनसे दूर रहने की चेष्टा करो।'

जो इच्छामात्र से अपने मन को केन्द्रो मे सलग्न करने अथवा उनसे हटा लेने मे सफल हो गया है, उसी का प्रत्याहार सिद्ध हुआ है । प्रत्याहार का अर्थ है, एक ओर आहरण करना अर्थात् खींचना—मन की बहिर्गति को रोककर, इन्द्रियों की अधीनता से मन को मुक्त करके उसे भीतर की ओर खींचना । इसमें कृतकार्य होने पर हम यथार्थ में चरित्रवान होगे; और तभी समझेगे कि हम मुक्ति के मार्ग मे बहुत दूर बढ गए हैं । यह यदि न किया जा सका, तो हममे तथा एक यन्त्र में फिर अन्तर ही क्या !

मन को सयंत करना कितना कठिन है ! इसकी उपमा एक उन्मत्त वानर से दी गई है, और वह कोई असंगत बात नही । कही एक बन्दर था । उसकी मर्कट-स्वभाववाली चंचलता तो थी ही, लेकिन उतने से सन्तुष्ट न हो, एक आदमी ने उसे काफी शराब पिला दी । इससे वह और भी चंचल हो गया । इसके बाद उसे एक बिच्छू ने डक मार दिया । तुम जानते हो, किसी को बिच्छू डंक मार दे, तो वह दिन भर इधर-उधर कितना