रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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शुद्धशिलाजीतपरीक्षा— वह्नि में डालने से लिङ्गाकार हो तथा धुआं न दे और जल में न घुले किन्तु नीचे सूत्र रूप में बैठ जाय वह उत्तम है ॥ १०७ ॥
अथ गुणाः— नूनं सज्वरपाण्डुशोफशमनं मेहाग्निमान्द्यापहं मेदच्छेदकरं च यक्ष्मशमनं शूलामयोन्मूलनम् । गुल्मप्लीहविनाशनं जठरहृच्छूलभ्रमामापहम् । सर्वत्वग्गदनाशनं किमपरं देहे च लोहे हितम् ॥ १०८ ॥ रसोपरससूतेन्द्ररत्नलोहेषु ये गुणाः । वसन्ति ते शिलाधातौ जरामृत्युजिगीषया ॥ १०९ ॥
शिलाजीत ज्वर, पाण्डुरोग, शोथ (सूजन), बीस प्रकार के प्रमेह तथा अग्निमान्द्य को नष्ट करती है । बढी हुई शरीर की चर्बी ( मेद ) को काट कर निकालती है तथा राजयक्ष्मा, शूल, गुल्म, प्लीहवृद्धि और उदर रोगों को नष्ट करती है । सम्पूर्ण चर्म की व्याधियों को नष्ट करती है । शरीर को लौह सदृश करती है । रस, उपरस, पारद, रत्न तथा सप्त धातुओं में जो गुण हैं वे मनुष्यों के जरा तथा मरण को जीतने के लिये मानों शिलाजीत में निवास करते हैं ॥ १०८-१०९ ॥
अथ शोधनम्— क्षाराम्लगोजलैध्रौतं शुद्धत्येव शिलाजतु ॥ ११० ॥ शिलाधातुं च दुग्धेन त्रिफलामार्कवद्रवैः । लोहपात्रे विनिक्षिप्य शोधयेदतियत्नतः ॥ १११ ॥ क्षाराम्लगुग्गुलोपेतैः स्वेदनीयन्त्रमध्यगैः । स्वेदिता घटिकामानाच्छिलाधातुर्विशुद्ध्यति ॥ ११२ ॥
क्षार, अम्ल तथा गोमूत्र से घोट कर धोने पर शिलाजीत शुद्ध हो जाती है । अथवा दुग्ध, त्रिफलाकाथ और भांगरे के स्वरस को लौह के पात्र में डाल कर शिलाजीत डाल दे । सूर्य की गर्मी से शुद्ध भाग द्रवों के ऊपर तैरने लगता है । बुद्धिमान उस तैरने वाले अंश को काच के पात्र में एकत्र करे । अथवा दोलायन्त्र में क्षार, अम्ल और गुग्गुल डाल कर उनके साथ शिलाजीत को एक घण्टे तक स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती है ॥ ११०-११२ ॥