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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

८२ रसरत्नसमुच्चये—

शुद्धशिलाजीतपरीक्षा— वह्नि में डालने से लिङ्गाकार हो तथा धुआं न दे और जल में न घुले किन्तु नीचे सूत्र रूप में बैठ जाय वह उत्तम है ॥ १०७ ॥

अथ गुणाः— नूनं सज्वरपाण्डुशोफशमनं मेहाग्निमान्द्यापहं मेदच्छेदकरं च यक्ष्मशमनं शूलामयोन्मूलनम् । गुल्मप्लीहविनाशनं जठरहृच्छूलभ्रमामापहम् । सर्वत्वग्गदनाशनं किमपरं देहे च लोहे हितम् ॥ १०८ ॥ रसोपरससूतेन्द्ररत्नलोहेषु ये गुणाः । वसन्ति ते शिलाधातौ जरामृत्युजिगीषया ॥ १०९ ॥

शिलाजीत ज्वर, पाण्डुरोग, शोथ (सूजन), बीस प्रकार के प्रमेह तथा अग्निमान्द्य को नष्ट करती है । बढी हुई शरीर की चर्बी ( मेद ) को काट कर निकालती है तथा राजयक्ष्मा, शूल, गुल्म, प्लीहवृद्धि और उदर रोगों को नष्ट करती है । सम्पूर्ण चर्म की व्याधियों को नष्ट करती है । शरीर को लौह सदृश करती है । रस, उपरस, पारद, रत्न तथा सप्त धातुओं में जो गुण हैं वे मनुष्यों के जरा तथा मरण को जीतने के लिये मानों शिलाजीत में निवास करते हैं ॥ १०८-१०९ ॥

अथ शोधनम्— क्षाराम्लगोजलैध्रौतं शुद्धत्येव शिलाजतु ॥ ११० ॥ शिलाधातुं च दुग्धेन त्रिफलामार्कवद्रवैः । लोहपात्रे विनिक्षिप्य शोधयेदतियत्नतः ॥ १११ ॥ क्षाराम्लगुग्गुलोपेतैः स्वेदनीयन्त्रमध्यगैः । स्वेदिता घटिकामानाच्छिलाधातुर्विशुद्ध्यति ॥ ११२ ॥

क्षार, अम्ल तथा गोमूत्र से घोट कर धोने पर शिलाजीत शुद्ध हो जाती है । अथवा दुग्ध, त्रिफलाकाथ और भांगरे के स्वरस को लौह के पात्र में डाल कर शिलाजीत डाल दे । सूर्य की गर्मी से शुद्ध भाग द्रवों के ऊपर तैरने लगता है । बुद्धिमान उस तैरने वाले अंश को काच के पात्र में एकत्र करे । अथवा दोलायन्त्र में क्षार, अम्ल और गुग्गुल डाल कर उनके साथ शिलाजीत को एक घण्टे तक स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती है ॥ ११०-११२ ॥

द्वितीयोऽध्यायः। ८३

द्वितीयोऽध्यायः। ८३

अथ शिलाजतुमारणम्— शिलया गन्धतालाभ्यां मातुलुङ्गरसेन च । पुटितो हि शिलाधातुर्म्रियतेऽष्टगिरिण्डकैः ॥ ११३ ॥

शिलाजीत की मारण विधि-शिलाजीत को मनः शिला, गन्धक तथा हरताल के साथ बिजौरे निम्बू के रस से घोट कर गोला बनाकर गज पुट में आठ जङ्गली उपलों द्वारा पुट देने से उसकी भस्म हो जाती है ॥ ११३ ॥

अथ प्रयोगविधिः— भस्मीभूतशिलोद्भवं समतुलं कान्तं च वैक्रान्तकं युक्तं च त्रिफलाकटुत्रिकघृतैर्वल्लेन तुल्यं भजेत् । पाण्डौ यक्ष्मगदे तथाग्निसदने मेहेषु मूलामये ॥ गुल्मप्लीहमहोदरे बहुविधे शूले च योन्यामये ॥ ११४ ॥ सेवेत यदि षण्मासं रसायनविधानतः । वलीपलितनिर्मुक्तो जीवेद्वर्षशतं सुखी ॥ ११५ ॥

शिलाजीत की भस्म, कान्तलौह भस्म और वैक्रान्तभस्म इन्हें समान २ भाग में परस्पर मिलाकर घोट लें । बाद में एक रत्ती की मात्रा से त्रिफला और त्रिकटु चूर्ण तथा घृत के सङ्ग सेवन करने से पाण्डुरोग, राजयक्ष्मा, अग्निमांद्य, प्रमेह, अर्श, गुल्म, प्लीह वृद्धि, जलोदर तथा अनेक प्रकार के उदर शूल और स्त्रियों के योनि रोग नष्ट हो जाते हैं । यदि इस रसायन को विधि पूर्वक ६ मास सेवन करे तो बालों का श्वेत होना तथा गिरना बन्द होकर सुख पूर्वक सौ वर्ष तक मनुष्य जीता रहता है ॥ ११४-११५ ॥

अथ सत्त्वपातनम्— पिष्टं द्रावणवर्गेण साम्लेन गिरिसम्भवम् । क्षिप्त्वा मूषोदरे रुद्ध्वा गाढैर्ध्मातं हि कोकिलैः ॥ सत्त्वं मुञ्चेच्छिलाधातुस्तत्क्षणाल्लोहसन्निभम् ॥ ११६ ॥

शिलाजीत को द्रावक वर्ग की गुड़, गुग्गुल, गुञ्जा, घृत इन औषधियों के साथ तथा काञ्जी इत्यादि अम्ल से पेषण करके मूषायन्त्र में डाल कर उसका मुख अवरुद्ध कर के बेर के कोयलों की अग्नि में फूंकने से सत्व निकल जाता है । यह सत्व लौह सदृश दृढ होता है ॥ ११६ ॥

८४ रसरत्नसमुच्चये—

अथ कर्पूरशिलाजतुनो लक्षणादिकम्—

पाण्डुरं सिकताकारं कर्पूराद्यं शिलाजतु ।
मूत्रकृच्छ्राश्मरीमेहकामलापाण्डुनाशनम् ॥ ११७ ॥
एलातोयेन सम्भिन्नं सिद्धं शुद्धिमुपैति तत् ।
नैतस्य मारणं सत्त्वपातनं विहितं बुधैः ॥ ११८ ॥
इति शिलाजित्त्वधिकारः ।

कर्पूर गन्धवाली शिलाजीत पाण्डुवर्ण तथा वालू के आकार की होती है । इस के सेवन से मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, प्रमेह, कामला और पाण्डुरोग नष्ट होता है । इस की शुद्धि इलायची के काथ में घोटने से होती है । आयुर्वेद के विद्वानों ने इसका मारण और सत्त्व पातन का विधान नहीं कहा है ॥ ११७-११८ ॥

अथ सस्यकः —

अथ सस्यकोत्पत्तिवर्णनम्—

पीत्वा हालाहलं वान्तं पीतामृतगरुत्मता ।
विषेणामृतयुक्तेन गिरौ मरकताह्वये ।
तद्वान्तं हि घनीभूतं सञ्जातं सस्यकं खलु ॥ ११९ ॥

किसी समय अमृत पान किये हुए गरुड़ जी ने हालाहल नामक विषका पान कर लिया । इस कारण अमृत और हालाहल विष के एकत्र होने से मरकत नामक पर्वत पर उन्हें वमन होगई । कुछ समय के पश्चात् वह वमन पदार्थ घन स्वरूप होकर नील तुत्थ के रूप में परिणत होगया ॥ ११९ ॥

प्रशस्तसस्यकलक्षणम्—

मयूरकण्ठसच्छायं भाराढ्यमतिशस्यते ॥ १२० ॥
द्रव्यं विषयुतं यत्तद्द्रव्याधिकगुणं भवेत् ।
सुधाहलाहलैर्युक्ता सुधाधिकगुणा तथा ॥ १२१ ॥

जो नील तुत्थ ( सस्यक ) मयूर के कण्ठ के समान नील वर्ण और भार युक्त हो वह औषध कर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ है । किसी द्रव्य में विष मिल जाने से उस के गुण बढ़ जाते हैं । इसी तरह हालाहल विष से युक्त सुधा भी सुधा (अमृत) से भी अधिक गुण प्रद हो जाती है ॥ १२०-१२१ ॥

द्वितीयोऽध्यायः ।
८५

अथ गुणाः—
निःशेषदोषविषहृद्गदशूलमूलकुष्ठाम्लपैत्तिकविबन्धहरं परञ्च ॥
रसायनं वमनरेककरं गरघ्नं श्वित्रापहं गदितमत्र मयूरतुत्थम् ॥१२२॥
नील तुत्थ कुपित वात पित्तादि सम्पूर्ण दोष, विषप्रभाव, हृदय रोग, शूल, अर्श, कुष्ठ, अम्लपित्त तथा विबन्ध (मलावरोध) को नष्ट करता है। यह अत्यन्त श्रेष्ठ रसायन है। इस से वमन तथा विरेचन कर्म होते हैं और श्वेत कुष्ठ तथा विष के आक्रमण को दूर करता है ॥ १२२ ॥

अथ शोधनम्—
सस्यकं शुद्धिमाप्नोति रक्तवर्गेण भावितम् ॥ १२३ ॥
नीलतुत्थ रक्त वर्ग में कही हुई जपाकुसुमादि औषधियों के रस की भावना से शुद्ध होता है ॥ १२३ ॥

अथ मतान्तरम्—
स्नेहवर्गेण संसिक्तं सप्तवारमदूषितम् ॥
दोलायन्त्रेण सुस्विन्नं सस्यकं प्रहरत्रयम् ।
गोमहिष्याजमूत्रेषु शुद्धयते तुत्थखर्परम् ॥ १२४ ॥
अथवा नील तुत्थ को तप्त कर स्नेह वर्गोक्त घृत, तैल, वसा आदि पदार्थों में सात बार बुझा कर शुद्ध करते हैं। केवल दोलायन्त्र में ३ प्रहर तक गौ, भैंस और बक़री के मूत्र के साथ स्वेदन करने से भी नीलतुत्थ शुद्ध हो जाता है ॥ १२४ ॥

अथ तुत्थखर्परमारणम्—
लकुचद्रावगन्धाश्मटङ्कणेन समन्वितम् ।
निरुध्य मूषिकामध्ये म्रियते कौक्कुटैः पुटैः ॥ १२५ ॥
शुद्ध नीलतुत्थ को समान गन्धक और टङ्कण के साथ बड़हल के फल के स्वरस में घोट कर मूषायन्त्र में बन्ध कर के कुक्कुट पुट देने से भस्म हो जाती है॥१२५॥

अथ तुत्थसत्त्वपातनम्—
सस्यकस्य तु चूर्णं तु पादसौभाग्यसंयुतम् ।
करञ्जतैलमध्यस्थं दिनमेकं निधापयेत् ॥ १२६ ॥
अन्धमूषास्यमध्यस्थं ध्मापयेत्कोकिलत्रयम् ।
इन्द्रगोपाकृति चैव सत्त्वं भवति शोभनम् ॥ १२७ ॥

८६ रसरत्नसमुच्चये—

नीलतुत्थ चूर्ण के साथ चौथाई भाग की मात्रा में सुहागा मिला कर घोटेँ । फिर उसको करञ्ज के तैल में एक दिन तक भिगो दे । तदनन्तर उसका गोला बनाकर अन्धमूषा में बन्दकर वैर (बदरी) काष्ठ के कोयलों की अग्नि में तीन दिन तक फूंकने से इन्द्रगोप (बीर बहूटी) के समान सुन्दर लालवर्ण का सत्व प्राप्त होता है॥ १२७॥

अथ मतान्तरम्—

निम्बुद्रवालपटङ्काभ्यां मूषामध्ये निरुध्य च ।
ताम्ररूपं परिध्मातं सत्वं मुञ्चति सस्यकम् ॥ १२८ ॥
शुद्धं सस्यं शिखिक्रान्तं पूर्वभेषजसंयुतम् ।
नानाविधानयोगेन सत्त्वं मुञ्चति निश्चितम् ॥ १२९ ॥

अथवा नीलतुत्थ चूर्ण के साथ कुछ टङ्कण (सुहागा) मिलाकर निम्बू के रस से घोट कर गोला बनावै । पश्चात् मूषायन्त्र में बन्दकर फूंकने से ताम्र के समान लाल वर्ण का सत्व प्राप्त होता है । शुद्ध नील तुत्थ चूर्ण को सत्त्वपातन कराने वाली पूर्वोक्त औषधियों के साथ मिला कर भिन्न २ सत्त्वपातन की विधियों द्वारा अग्नि देने से सत्व प्राप्त हो जाता है ॥ १२८-१२९ ॥

अथ प्रयोगविधिः—

सत्त्वमेतत्समादाय खरभूनागसत्त्वयुक् ।
तन्मुद्रिका कृतस्पर्शा शूलघ्नी तत् क्षणाद्भवेत् ॥ १३० ॥
चराचरं विषं भूतडाकिनीदृग्गतं जयेत् ।
मुद्रिकेयं विधातव्या दृष्टप्रत्ययकारिका ॥ १३१ ॥

नील तुत्थ का सत्व, दुरालभा और केंचूए (अर्थ वर्म) का सत्व इन को मिला कर अंगूठी बनवावे । इस के स्पर्श मात्र से शीघ्र ही शूल नष्ट हो जाता है । किसी पुस्तक में खर के स्थान में कर्ष शब्द लिखा है उस मत से एक कर्ष केंचूए का सत्व लेना चाहिए, दुरालभा नहीं लेवें । इस अंगूठी के प्रभाव से स्थावर और जङ्गम विष तथा भूत, प्रेत और डाकिनियों की दृष्टि से उत्पन्न बाधाएं दूर हो जाती हैं तथा यह मुद्रिका प्रत्यक्ष विश्वास पैदा कराने वाली है ॥ १३०-१३१ ॥

अथ भालुकितन्त्रोक्तप्रयोगविधिः—

रामवत्स्रोमसेनानीर्मुद्रितेऽपि तथाऽक्षरम् ।
हिमालयोत्तरे पार्श्वे अश्वकर्णो महाद्रुमः ।

द्वितीयोऽध्यायः । ८७

तत्र शूलं समुत्पन्नं तत्रैव विलयं गतम् ॥ १३२ ॥
मन्त्रेणानेन मुद्राम्भो निपीतं सप्तमन्त्रितम् ।
सद्यःशूलहरं प्रोक्तमिति भालुकिभाषितम् ॥ १३३ ॥
अनया मुद्रया तप्तं तैलमग्नौ सुनिश्चितम् ।
लेपितं हन्ति वेगेन शूलं यत्र क्वचिद्भवेत् ॥
सद्यः सूतिकरं नार्याः सद्यो नेत्ररुजापहम् ॥ १३४ ॥
इति सस्यकाधिकारः ।

राम शब्द से लेकर गतम् यहां तक मन्त्र का स्वरूप है। इस मन्त्र को पढ़ते हुए मुद्रा को जल में छोड़ दे' । इस तरह सात वार मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित कर के पीलाने से शीघ्र ही शूल नष्ट होजाता है । यह भालुकि महर्षि का कथन है । इस अंगूठी को तैल में डाल कर अग्नि पर पकावें । फिर जहां कहीं शूल चलता हो वहां इस तैल के लगाने से शूल चलना वन्द हो जाता है तथा गर्भवती स्त्रियों के हस्त पाद पर लगा के मर्दन करने से तुरन्त प्रसव होता है । नेत्रों में लगाने से नेत्र पीड़ा दूर हो जाती है ॥१३२-१३४॥

अथ चपलः—
गौरः श्वेतोऽरुणः कृष्णश्चपलस्तु चतुर्विधः ।
हेमाभश्चैव ताराभो विशेषाद्रसबन्धनः ॥ १३५ ॥
शेषौ तु मध्यौ लाक्षावच्छीघ्रद्रावौ तु निष्फलौ ।
वङ्गवद्द्रवते वह्नौ चपलस्तेन कीर्तितः ॥ १३६ ॥

चपल धातु सर्षप वर्ण युक्त ( गौर ) और श्वेत, रक्त तथा कृष्ण इस तरह चार प्रकार का होता है। गौर और श्वेत चपल पारद के बन्धन करने में श्रेष्ठ हैं । शेष रक्त तथा कृष्ण वर्ण की चपल लाह के समान शीघ्र द्रव हो जाने के कारण मध्यम कही गई है तथा उन से विशेष फल भी नहीं होता है । यह धातु अग्नि में वङ्ग ( रांगा ) के समान द्रव हो जाता है । इस कारण इसको चपल कहते हैं ॥ १३५-१३६ ॥

**विमर्श:—**चपल को बिस्मथ ( Bismuth ) कहते हैं । इसका संकेत Bi है तथा परमाणु भार ( Atomic weights ) २०९ है ।
**उपस्थिति—**यह धातु मुक्तावस्था में भी पाई जाती है । इस धातु की प्राप्ति

४८ रसरत्नसमुच्चये-

प्रायः बिस्मथ आक्साइड ( Bismuth oxide Bi ₂ S ₂ ) और बिस्मथ तथा बिस्मथ सल्फाईड ( Bismuth sulphide बिस्मथ ग्लांस Bi ₂ S ₂ ) । इन दो प्रधान खनिजों से होती है तथा टङ्गस्टेन और वङ्ग के खनिजों के साथ भी थोड़ी मात्रा में बिस्मथ पाया जाता है ।

बिस्मथ की उपलब्धि बिस्मथ आक्साइड ( Bismuth oxide ) को कोयलों के साथ गरम करने से आक्साइड लघ्वीकृत हो बिस्मथ मुक्त हो जाता है तथा द्रव अवस्था में बह कर कोयले से पृथक् हो जाता है ।

यह क्रिया इस प्रकार होती है । ₂ Bi ₂03+C=4 Bi+3 co 2

गुण—बिस्मथ भूरे रङ्ग की रक्त आभा ली हुई क्रिस्टलीय धातु है । यह कठोर और भङ्गुर होती है । इस में चमकीली धातुकद्युति होती है । इस का विशिष्ट घनत्व ७८ होता है । यह ७०° से० पर के तापक्रम पर पिघलती है ।

यह वायु या आक्सिजन से आक्रान्त नहीं होती है परन्तु तीव्र आंच से वायु में आक्साइड के रूप में परिणत हो जाती है । तनु गन्धकाम्ल और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की भी इस पर कोई क्रिया नहीं होती है । तप्त गन्धकाम्ल से यह बिस्मथ सल्फेट ( Bi 2 so 4 ) 3 और सल्फर डाई-आक्साइड ( Sulphur Di oxide ) में परिणत हो जाता है । तनु अथवा समाहृत नाइट्रिक अम्ल से यह शीघ्रता से आक्रान्त होकर बिस्मथ नाइट्रेट बनती है और नाइट्रोजन का आक्साइड मुक्त करती है ।

बिस्मथ का उपयोग—आज कल इस का स्टीरियो टाइप में अधिक प्रयोग होता है तथा निम्न तापक्रम पर पिघलने वाली अनेक धातुओं के निर्माण में प्रयुक्त होती है । बिस्मथ के अनेक आक्साइड होते हैं । उन में बिस्मथ ट्राइ-आक्साइड् और बिस्मथ पेण्टाक्साइड मुख्य हैं । बिस्मथ का सल्फाईड प्रकृति में भी पाया जाता है और कृत्रिम रीति से भी तैयार हो सकती है । बिस्मथ के सामान्य नाइट्रेट और भास्मिक नाइट्रेट होते हैं । इसका पाश्चात्य चिकित्साशास्त्र में उदर रोग और उपदंश आदि में विशेष प्रयोग होता है । किन्तु हमारे चिकित्सक इसका प्रयोग नहीं करते हैं । वैद्य बन्धुओं को इसका प्रयोग कर के लाभ उठाना चाहिए ।

अथ गुणाः— चपलो लेखनः स्निग्धो देहलोहकरो मतः । रसराजसहायः स्यात्तिक्तोष्णमधुरो मतः ॥ १३७ ॥ चपलः स्फटिकच्छायः षडस्रः स्निग्धको गुरुः । त्रिदोषघ्नोऽतिवृष्यश्च रसबन्धविधायकः ॥ १३८ ॥

द्वितीयोऽध्यायः।

द्वितीयोऽध्यायः। ८९

महारसेषु कैश्चिद्धि चपलः परिकीर्तितः ॥ १३९ ॥

चपल धातु लेखन (मोटे शरीर को पतला करना) तथा स्निग्ध है और शरीर को लौह समान दृढ करती है। पारद के साथ मिलाने से अधिक गुण प्रद और स्वाद में तिक्त मधुर तथा उष्ण प्रकृति वाली है। चपल श्वेत पाषाण या फिटकरी के सदृश और षट् कोण युक्त होती है। यह स्निग्ध, गुरु, त्रिदोषनाशक, अत्यन्त वृष्य और पारद बन्धन करती है। कुछ विद्वानों की सम्मति है कि महा रसों में चपल की भी गणना है ॥ १३७-१३९ ॥

अथ शोधनम्— जम्बीरकर्कोटकाशृङ्गवेरैर्विभावनामिश्चपलस्य शुद्धिः ॥१४०॥

चपल धातु को चूर्ण करके निम्बू, वन्ध्या कर्कोटकी तथा आर्द्रक के रस की सात भावना देने से शुद्ध हो जाती है ॥ १४० ॥

अथ सत्त्वपातनम्— शैलं तु चूर्णयित्वा तु धान्याम्लोपविषैर्विषैः ।
पिण्डं बध्वा तु विधिवत्पातयेच्चपलं तथा ॥ १४१ ॥
इति चपलाधिकारः ।

चपल को काञ्जी, विष तथा उपविष के क्वाथों की भावना देकर (अर्थात् इन से घोटकर) गोला बना कर मूषा में फूंकने से सत्व निकल जाता है ॥ १४१ ॥

अथ रसकः— रसको द्विविधः प्रोक्तो दर्दुरः कारवेल्लकः ।
सदलो दर्दुरः प्रोक्तो निर्दलः कारवेल्लकः ॥ १४२ ॥

रसक अर्थात् खर्पर दो प्रकार का होता है। जो पत्ररूप रचना वाला होता है उसे दर्दुर कहते हैं और जिसमें पत्र रचना नहीं होती है उसे कारवेल्लक कहते हैं ॥ १४२ ॥

**विमर्शः—**रसक को खर्पर कहते हैं तथा इसका अङ्गरेजी नाम स्मिथ सोनाइट (Smithsonite) तथा केलेमाइट (Calamite) है। प्राचीन रस शास्त्र में जो इसके दो भेद (रसको द्विविधः प्रोक्तो दर्दुरः कारवेल्लकः) किये गये हैं उनमें कारवेल्लक खर्पर के लक्षण स्मिथ सोनाइट के साथ तथा दर्दुर खर्पर के लक्षण केलोमाइट के साथ मिलते जुलते हैं। प्रथम जिङ्क सिलिकेट है तथा द्वितीय जिङ्क कार्बोनेट है।

९० रसरत्नसमुच्चये—

औषधिकर्म में प्रथम का प्रयोग प्रशस्त है। यह प्रायः अमेरिका की खानों से आता है। आज काल बाजार में खर्पर नाम से जो खनिज आता है वह एक प्रकार की मृत्तिका है जहां तक हो सके उसका प्रयोग न करें शुद्ध खनिज मंगवा कर ही प्रयोग करना चाहिए।

सस्यकस्य प्रयोगविषयो गुणाश्च—

सत्त्वपाते शुभः पूर्वो द्वितीयश्चौषधादिषु ।
रसकः सर्वमेहघ्नः कफपित्तविनाशनः ॥
नेत्ररोगक्षयघ्नश्च लोहपारदरञ्जनः ॥ १४३ ॥
नागार्जुनेन सन्दिष्टौ रसश्च रसकावुभौ ।
श्रेष्ठौ सिद्धरसौ ख्यातौ देहलोहकरौ परम् ॥ १४४ ॥
रसश्च रसकश्चोभौ येनाग्निसहनौ कृतौ ।
देहलोहमयी सिद्धिर्दासी तस्य न संशयः ॥ १४५ ॥

दर्दुरु नामक खर्पर का सत्त्वपातन कर्म में प्रयोग होता है तथा औषधियों में कारवेल्लक का प्रयोग होता है । खर्पर बीस प्रकार के प्रमेह, कफ, पित्त, नेत्ररोग और राजयक्ष्मा को नष्ट करता है । लोह तथा पारद को रङ्ग देता है । नागार्जुनाचार्य ने खर्पर तथा पारद को सिद्ध रस कहा है तथा ये दोनों देह को स्थिर करते हैं । जो मनुष्य खर्पर तथा पारद को अग्नि में नहीं उड़ने वाले धर्म का बना देता है अथवा जो मनुष्य दोनों को अपनी पाचकाग्नि से पचा लेता है उसकी देहसिद्धि दासी बन जाती है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है ॥ १४३–१४५ ॥

अथ शोधनम्—

कटुकालाबुनिर्यास आलोद्य रसकं पचेत् ।
शुद्धं दोषविनिर्मुक्तं पीतवर्णं च जायते ॥ १४६ ॥

खर्पर को कड़वी तुम्बी के रस में घोट कर पकाने से दोषरहित और शुद्ध होजाता है तथा इसका रङ्ग पीला होजाता है ॥ १४६ ॥

अथ मतान्तरम्—

खर्परः परिसन्तप्तः सप्तवारं निमज्जितः ।
बीजपूररसस्यान्तर्निर्मलत्वं समश्नुते ॥ १४७ ॥
नृमूत्रे वाऽश्वमूत्रे वा तक्रे वा काञ्जिकेऽथवा ।
प्रताप्य मज्जितं सम्यक् खर्परं परिशुद्ध्यति ॥ १४८ ॥

द्वितीयोऽध्यायः । ۹१

खर्पर को अग्नि में खूब प्रत्तप्त कर बिजौरे निम्बू के रस में सात बार बुझाने-से शुद्ध हो जाता है। अथवा नरमूत्र, हयमूत्र तथा तक्र और काञ्जी में तप्त कर बुझाने से भी शुद्ध होजाता है ॥ १४७-१४८ ॥

अथ रसकस्य ताम्रादिरञ्जनविधिः—

नरमूत्रे स्थितो मासं रसको रञ्जयेद्ध्रुवम् ।
शुद्धताम्रं रसं तारं शुद्धस्वर्णप्रभं यथा ॥ १४९ ॥

खर्पर को एक मास तक मनुष्य के मूत्र में डुबो कर रखने से शुद्धताम्र, पारद तथा चांदी को सुवर्ण के समान कान्तियुक्त कर देता है ॥ १४९ ॥

अथ खर्परस्य भस्म तथा सत्त्वपातनविधिश्च—

हरिद्रात्रिफलारालसिन्धुधूमैः सटङ्कणैः ।
सारुष्करैश्च पादांशैः साम्लैः सम्मर्द्य खर्परम् ॥ १५० ॥
लिप्तं वृन्ताकमूषायां शोषयित्वा निरुध्य च ।
मूषां मूषोपरि न्यस्य खर्परं प्रधमेत्ततः ॥ १५१ ॥
खर्परे प्रद्रुते ज्वाला भवेन्नीला सिता यदि ।
तदा सन्दंशतो मूषां धृत्वा कृत्वा त्वधोमुखीम् ॥ १५२ ॥
शनैरास्फालयेद्भूतौ यथा नालं न भज्यते ।
वङ्गाभं पतितं सत्त्वं समादाय नियोजयेत् ।
एवं त्रिचतुरैर्वारैः सर्वं सत्त्वं विनिःसरेत् ॥ १५३ ॥

शुद्ध खर्पर के चूर्ण में हरिद्रा, त्रिफला, राल, गृहधूम सुहागा, भल्लातक (भिलांवा) प्रत्येक खर्पर से चतुर्थांश भाग की मात्रा से मिला कर काञ्जी या निम्बू के रस में घोट कर वृन्ताक नाम की मूषा में लेप कर दें। सूखने पर मूषा का मुख बन्द करके इसे दूसरी मूषा के ऊपर रखकर अग्नि में फूंके। इस तरह खर्पर के द्रुत होने पर मूषा से श्वेत या नीली ज्वाला निकलने लगे तब उसे संड़सी से पकड़ कर पृथ्वी की ओर मुख औंधा कर ताड़न करे। परन्तु मूषा की नाल को बचाना चाहिए। इस तरह वङ्ग के समान सत्त्व निकलता है। इस विधि को तीन या चार वार करने से सम्पूर्ण सत्त्व निकल जाता है। इसका सर्वत्र प्रयोग करें ॥ १५०-१५३ ॥

९२ रसरत्नसमुच्चये-

अथ मतान्तरम्- साभयाजतुभूनागनिशाधूमजटङ्कणम् । मूकमूषागतं ध्मातं शुद्धं सत्त्वं विमुञ्चति ॥ १५४ ॥ अथवा हरीतकी, लाक्षा, केंचुआ ( अर्थवर्म ), हरिद्रा, घर का धुंआं, सुहागा, इन सबको खर्पर से चतुर्थांश भाग की मात्रा से लेकर खर्पर चूर्ण को मूकमूषा में रख कर फूंकने से सत्त्व निकल जाता है ॥ १५४ ॥

अथ मतान्तरम्- लाक्षागुडाऽऽसुरीपथ्याहरिद्रासर्जटङ्कणैः । सम्यक् सञ्चूर्ण्य तत्पक्वं गोगुग्धेन घृतेन च ॥ १५५ ॥ वृन्ताकमूषिका मध्ये निरुध्य गुटिकाकृतम् । ध्मात्वा ध्मात्वा समाकृष्य ढालयित्वा शिलातले । सत्त्वं वङ्गाकृति ग्राह्यं रसकस्य मनोहरम् ॥ १५६ ॥ अथवा लाक्षा, गुड़, राई ( राजिका ) हरड़, हल्दी, राल और टङ्कण इनका चूर्णकर खर्पर के साथ घोटें । फिर गोघृत और दुग्ध से पका कर गोला बनालें । फिर उस गोले को वृन्ताक मूषा में रखकर उसका मुख बन्द कर फूंकें । पश्चात् किसी पत्थर पर मूषा को ढालने से वङ्ग के समान सुन्दर सत्त्व निकल आता है ॥ १५५-१५६ ॥

अथ मतान्तरम्- यद्वा जलयुतां स्थालीं निखनेत्कोष्ठिकोदरे । सच्छिद्रं तन्मुखे मल्लं तन्मुखेऽधोमुखीं क्षिपेत् ॥ १५७ ॥ मूषोपरि शिखित्रांश्च प्रक्षिप्य प्रधमेद्द्रुढम् । पतितं स्थालीकानीरे सत्त्वमादाय योजयेत् ॥ १५८ ॥ अथवा एक हांडी में जल भर कर उसे जमीन में गाड़ देवे । उस स्थाली के मुख पर छिद्र वाला एक सकोरा रख दें । उस सकोरे पर मूषा का ख वाला भाग रख कर मूषा पर कोयले डालकर अग्नि पर फूके । खूब प्रधमन करने से मूषा के मुख से सत्त्व निकल कर हाण्डका के जल में गिर जायगा । उसको लेकर औषधियों के कार्य में प्रयोग करना चाहिए ॥ १५७-१५८ ॥

द्वितीयोऽध्यायः। ९३

अथ सत्त्वमारणम्—

तत्सत्त्वं तालकोपेतं प्रक्षिप्य खलु खर्परे ।
मर्दयेल्लोहदण्डेन भस्मीभवति निश्चितम् ॥ १५९ ॥

खर्पर सत्त्व को कड़ाही में डाल कर उसमें समान मात्रा से हरताल डाल कर अग्नि पर रख दे और लौह के दण्ड से चलाता रहे। इस तरह खर्पर सत्त्व की भस्म हो जाती है ॥ १५९ ॥

अथ प्रयोगविधिः—

तद् भस्म मृतकान्तेन समेन सह योजयेत् ।
अष्टगुञ्जामितं चूर्णं त्रिफलाक्वाथसंयुतम् ॥ १६० ॥
कान्तपात्रस्थितं रात्रौ तिलजप्रातवापकम् ।
निषेवितं निहन्त्याशु मधुमेहमपि ध्रुवम् ॥ १६१ ॥
पित्तं क्षयं च पाण्डुं च श्वयथुं गुल्ममेव च ।
रक्तगुल्मं च नारीणां प्रदरं सोमरोगकम् ॥ १६२ ॥
योनिरोगानशेषांश्च विषमांश्च ज्वरानपि ।
रजःशूलं च नारीणां कासं श्वासञ्च हिध्मिकाम् ॥ १६३ ॥

इति रसकाधिकारः।
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये रसोत्पत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

खर्पर सत्त्व की भस्म को समान कान्तलौह भस्म के साथ मिला दें। इसमें से ८ रत्ती (गुञ्जा) लेकर एक कान्त लौह के पात्र में डालकर उसमें त्रिफला क्वाथ पूर्णमात्रा में भर दें, रात भर पड़ा रख कर प्रातःकाल इसमें कुछ तिलों का क्षार डाल कर सेवन करने से मधुमेह (डायबेटिज्), पित्त के रोग, क्षय, पाण्डु, शोथ, गुल्म, स्त्रियों का रक्तगुल्म, प्रदर और सोमरोग, सम्पूर्ण योनिरोग, विषम ज्वर (मलेरिया), रजःप्रवृत्तिकालीन शूल, कास, श्वास हिवकी आदि अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ १६०–१६३ ॥

इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकायां रसोत्पत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥

९४ रसरत्नसमुच्चये—

अथ तृतीयोऽध्यायः ।

अथोपरसानां नामानि—

गन्धाश्मगैरिकासीसकांक्षीतालशिलाञ्जनम् ।
कङ्कुष्ठं चेत्युपरसाश्चाष्टौ पारदकर्मणि ॥ १ ॥

गन्धक ( सल्फर ), गैरिक, कासीस, सुराष्ट्रमृत्तिका ( कांक्षी ), हरताल, मैनशील, अञ्जन, कङ्कुष्ठ ये आठ उपरस हैं । इनका पारद के कार्य में उपयोग होता है ॥ १ ॥

अथ गन्धकोत्पत्तिः—

पार्वत्युवाच ।
गन्धकस्य तु महात्म्यं तद्गुह्यं वद मे विभो ॥ २ ॥

हे भगवन् गन्धक का गुप्त माहात्म्य मुझे सुनाईये ॥ २ ॥

ईश्वर उवाच ।
श्वेतद्वीपे पुरा देवि सर्वरत्नविभूषिते ।
सर्वकाममये रम्ये तीरे क्षीरपयोनिधेः ॥ ३ ॥
विद्याधरीभिर्मुख्याभिरङ्गनाभिश्च योगिनाम् ।
सिद्धाङ्गनाभिः श्रेष्ठाभिस्तथैवाप्सरसां गणैः ॥ ४ ॥
देवाङ्गनाभी रम्याभिः क्रीडन्तीभिर्मनोहरैः ।
गीतैर्नृत्यैर्विचित्रैश्च वाद्यैर्नानाविधैस्तथा ॥ ५ ॥
एवं संक्रीडमानायाः प्राभवत्प्रस्रुतं रजः ।
तद्रजोऽतीव सुश्रोणि सुगन्धि सुमनोहरम् ॥ ६ ॥
रजसश्चातिबाहुल्याद्वासस्ते रक्ततां ययौ ।
तत्र त्यक्त्वा तु तद्वस्त्रं सुस्नाता क्षीरसागरे ॥ ७ ॥
वृता देवाङ्गनाभिस्त्वं कैलासं पुनरागता ।
ऊर्मिभिस्तद्रजोवस्त्रं नीतं मध्ये पयोनिधेः ॥ ८ ॥
एवं ते शोणितं भद्रे प्रविष्टं क्षीरसागरे ।
क्षीराब्धिमथने चैतदमृतेन सहोत्थितम् ॥ ९ ॥
निजगन्धेन तान्सर्वान्हर्षयन्सर्वदानवान् ।
ततो देवगणैरुक्तं गन्धकाख्यो भवत्वयम् ॥ १० ॥

तृतीयोऽध्यायः । ९५

तृतीयोऽध्यायः । ९५

रसस्य बन्धनाथार्य जारणाय भवत्वलम् । ये गुणाः पारदे प्रोक्तास्ते चैवात्र भवन्विति ॥ ११ ॥ इति देवगणैः प्रीतैः पुरा प्रोक्तं सुरेश्वरि । तेनायं गन्धको नाम विख्यातः क्षितिमण्डले ॥ १२ ॥ इस तरह पार्वतीजी के प्रश्न करने पर शिवजी कहने लगे हे देवि ? किसी समय श्वेतद्वीप नामक देश में सर्वरत्नों से शोभायमान, निखिल कामदेव की सामग्री वाले क्षीरसमुद्र के तट पर श्रेष्ठ सिद्धाङ्गनाओं, अप्सराओं, विद्याधरियों योगिनियों और देवताओं की स्त्रियों के साथ नाना प्रकार की रासक्रीड़ा तथा मनोहर गीत, नृत्य, वाद्य आदि क्रीड़ा करते करते तुम्हारा रजःस्राव हो गया । हे सुश्रोणि ? वह रज अत्यन्त सुगन्धित और मनोहर तथा उस रज के अधिक निकलने से तुम्हारे वस्त्र लाल हो गये, तब तुम उन रञ्जित वस्त्रों को वहीं छोड़ कर क्षीर समुद्र में स्नान कर देवताओं की स्त्रियों के साथ कैलास पर्वत पर चली आईं । उधर वे रज के वस्त्र तरङ्गों के द्वारा क्षीरसमुद्र में मिल गये । हे भद्रे ? इस तरह तुम्हारा आर्तव शोणित क्षीर सागर में प्रविष्ट हो गया । जिस समय क्षीर सागर का मथन होने लगा उस समय यह रज सभी दानवों को अपनी सुगन्ध से प्रसन्न करता हुआ अमृत के साथ बाहर निकला, तब देव समाज ने कहा कि यह संसार में गन्धक कहलाएगा और पारद के बन्धन तथा जारण के लिये समर्थ होगा और जो गुण पारद में हैं वे सब इस में भी होंगे । हे सुरेश्वरि ? प्रसन्न हुए देवताओं ने इस तरह गन्धक के विषय में कहा है । तभी से यह खनिज संसार में गन्धक के नाम से विख्यात हुआ ॥ ३-१२ ॥ अथ गन्धकभेदाः— स चापि त्रिविधो देवि शुकचञ्चुनिभो वरः । मध्यमः पीतवर्णः स्याच्छुक्लवर्णोऽधमः प्रिये ॥ १३ ॥ चतुर्धा गन्धको ज्ञेयो वर्णैः श्वेतादिभिः खलु । श्वेतोऽत्र खटिका प्रोक्तो लेपने लोहमारणे ॥ १४ ॥ तथो चामलसारः स्याद्यो भवेत्पीतवर्णवान् । शुकपिच्छः स एव स्याच्छ्रेष्ठो रसरसायने ॥ १५ ॥ रक्तश्च शुकतुण्डाख्यो धातुवादविधौ वरः ।

९६ | रसरत्नसमुच्चये—

दुर्लभः कृष्णवर्णश्च स जरामृत्युनाशनः ॥ १६ ॥

हे देवि ! वह गन्धक तीन प्रकारका है । प्रथम तोते की चोञ्च के समान लाल वर्ण वाला होता है वह उत्तम है। दूसरा पीले वर्ण का होता है वह मध्यम होता है। तृतीय श्वेत वर्ण का होता है वह अधम है। कुछ लोगों का मत है कि श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण भेद से गन्धक चार तरह का होता है । इन में श्वेत गन्धक को खटिक कहते हैं । क्यों कि यह खड़िया के समान सफेद होता है । यह लेप करने में तथा लौह मारण में काम आता है और जो गन्धक पीले वर्ण का होता है उसे आमला सार गन्धक कहते हैं । इसी का एक दूसरा भेद होता है, उस का नाम शुक पिच्छ है, वह रस और रसायन में श्रेष्ठ होता है । जो गन्धक तोते की चोञ्च समान होता है वह सोना, चांदी इत्यादि धातुओं के बनाने में श्रेष्ठ होता है। जो कृष्ण वर्ण का गन्धक होता है वह जरा और मृत्यु को नष्ट करता है किन्तु वह दुर्लभ है ॥ १३-१६ ॥

अथ गन्धकगुणाः—

गन्धाश्मातिरसायनः सुमधुरः पाके कटूष्णो मतः ।
कण्डूकुष्ठविसर्पदद्रुदलनो दीप्तानलः पाचनः ॥
आमोन्मोचनशोषणो विषहरः सूतेन्द्रवीर्यप्रदः ।
गौरीपुष्पभवस्तथा कृमिहरःसत्त्वात्मकः सूतजित् ॥ १७ ॥
बलिना सेवितः पूर्वं प्रभूतबलहेतवे ॥ १८ ॥

गन्धक श्रेष्ठ रसायन है तथा स्वाद में मधुर तथा पाक में कटु एवं उष्ण है । यह खुजली, कुष्ठ, विसर्प ( फैलने वाली खुजली ) और दद्रु को नष्ट करता है, पाचन शक्ति बढ़ाता है, अग्नि दीप्त करता है, आंव को दूर करता है तथा उस का शोषक है, विषनाशक तथा पारद के गुणों का उत्कर्ष बढ़ाता है । प्लीहावृद्धि, आध्मान और कृमियों को नष्ट करता है । सत्त्वस्वरूप गन्धक पारद को जीतने वाला है। पूर्वकाल में शक्ति प्राप्ति के लिये राजा बली ने इस का सेवन किया था ॥ १७-१८ ॥

अथ बलिवसाख्यगन्धकोत्पत्तिः—

वासुकिं कर्षतस्तस्य तन्मुखज्वालया द्रुता ।
वसा गन्धकगन्धाढ्या सर्वतो निःसृता तनोः ॥ १६ ॥
गन्धकत्वं च सम्प्राप्ता गन्धोऽभूत्सविषःस्मृतः ।

तृतीयोऽध्यायः । ९७

तस्माद्वलिवसेत्युक्तो गन्धकोऽतिमनोहरः ॥ २० ॥

समुद्र के मन्थन के समय वासुकी को खींचते हुए उस के मुख की ज्वाला से मिली हुई राजा बली के शरीर से गन्धक की गन्ध से मिली हुई जो वसा (चर्बी) निकली वही गन्धक के स्वरूप को प्राप्त होकर विषगन्धक कहलाई । इस अत्यन्त मनोहर गन्धक को बलिवसा कहते हैं ॥ १९–२० ॥

अथ गन्धकशुद्धिः— पयः स्विन्नो घटीमात्रं वारिधौतो हि गन्धकः । गव्याज्यविद्रुतो वस्त्राद्गालितः शुद्धिमृच्छति ॥ २१ ॥ एवं संशोधितः सोऽयं पाषाणानंबरे त्यजेत् । घृते विषं तुषाकारं स्वयं पिण्डत्वमेव च ॥ २२ ॥ इति शुद्धो हि गन्धाश्मा नापथ्यैर्विकृतिं व्रजेत् । अपथ्यादन्यथा हन्यात्पीतं हालाहलं तथा ॥ २३ ॥

गन्धक को एक घण्टे तक दुग्ध में स्वेदन कर जल से धो डालें । फिर उसे चूल्हे पर कढ़ाई में द्रव कर के वस्त्र से छान डालें । इस प्रकार से शुद्ध हुए गन्धक के पाषाण के टुकड़े तथा अन्य मल निकल जाते हैं। और विष बिन्दुओं के रूप में घी के ऊपर तैरने लगता है । स्वयं गन्धक ठंडक से पिण्ड के स्वरूप का हो जाता है । इस तरह से शुद्ध गन्धक के सेवन करने पर अपथ्य होने पर भी विकार उत्पन्न नहीं होता । किन्तु अशुद्ध गन्धक सेवन करने पर अपथ्य हो जाय तो वह हालाहल विष की तरह मनुष्य को मार डालता है । गन्धक को पिघला (द्रुत) कर भृङ्गराज के रस मेँ छोड़ने से शुद्ध हो जाता है । इस तरह सात बार करना चाहिए । प्रत्येक समय में भृङ्गराज का रस बदलना चाहिये और गन्धक को उष्ण जल से धोना चाहिए ॥ २१–२३ ॥

मतान्तरम्— गन्धको द्रावितो भृङ्गरसे क्षिप्तो विशुध्यति । तद्रसैः सप्तधा भिन्नो गन्धकः परिशुध्यति ॥ २४ ॥

अथवा गन्धक को द्रुत करके सात बार भृङ्गराज (भांगरे) के रस में बुझाने से भी शुद्धि हो जाती है अथवा भृङ्गराज के स्वरस से आप्लावित करके सूर्योदय से सूर्यास्त तक घोटे’ । इस तरह सात बार घोटने से वह शुद्ध हो जाता ॥ २४ ॥

रस० ७

९८ रसरत्नसमुच्चये-

अथ मतान्तरम्-

स्थाल्यां दुग्धं विनिक्षिप्य मुखे वस्त्रं निबध्य च । गन्धकं तत्र निक्षिप्य चूर्णितं सिकताकृतिम् ॥ २५ ॥ छादयेत्पृथुदीर्घेण खर्परेणैव गन्धकम् । ज्वालयेत्खर्परस्योर्ध्वं वनच्छाणैस्तथोपलैः ॥ २६ ॥ दुग्धे निपतितो गन्धो गलितः परिशुध्यति । शतवारं कृतञ्चैव निर्गन्धो जायते ध्रुवम् ॥ २७ ॥

एक हण्डिका में दुग्ध (जितने में गन्धक डूब सके) भर कर पतले शुद्ध वस्त्र से उसका मुख बांध देना चाहिए तथा उस वस्त्र पर गन्धक का बारीक चूर्ण कर रख दें और ऊपर से शराव द्वारा ढक दें, बाद में सकोरे पर जङ्गली उपलों (छाणों) की अग्नि जलादें। इससे गन्धक पिघल कर वस्त्र से छन कर दुग्ध में पड़ जाता है और शुद्ध हो जाता है। इस तरह सौ बार करने से गन्धक निःसन्देह गन्ध रहित हो जाता है ॥ २५–२७ ॥

अथ प्रयोगः-

इत्थं विशुद्धस्त्रिफलाज्यभृङ्गमध्वन्वितः शाणमितो हि लीढः । गृध्राक्षितुल्यं कुरुतेऽक्षियुग्मं करोति रोगोज्झितदीर्घमायुः ॥ २८ ॥

इस तरह उपर्युक्त विधि से शतवार शुद्ध किया हुआ गन्धक एक शाण (चोअन्नी भर) लेकर उसमें त्रिफला चूर्ण, मधु, भांगरे का रस और घृत मिला कर प्रतिदिन सेवन करने से दोनों नेत्र गिद्ध की आंख के समान दूर की वस्तुओं को देखने में समर्थ हो जाते हैं और रोग रहित होकर मनुष्य दीर्घ आयु प्राप्त करता है ॥ २८ ॥

अथ गन्धकद्रुतिः-

कलांशव्योषसंयुक्तं गन्धकं श्लक्ष्णचूर्णितम् । अरत्निमात्रे वस्त्रे तद्विप्रकीर्य विवेष्ट्य तत् ॥ २६ ॥ सूत्रेण वेष्टयित्वाऽथ यामं तैले निमज्जयेत् । धृत्वा संदंशतो वर्त्तिमध्यं प्रज्जवालयेच्च तम् । द्रुतो निपतितो गन्धो बिन्दुशः काचभाजने ॥ ३० ॥

शुद्ध गन्धक में षोडशांस त्रिकटु (सोंठ, मिर्च, पीपल) का चूर्ण मिला कर

तृतीयोऽध्यायः । ९९

तृतीयोऽध्यायः । ९९

खरल में दोनों का अत्यन्त बारीक चूर्ण करलें, इस चूर्ण को एक हाथ चौरस कपड़े पर बिछा कर उसे मोड़ कर दृढ़ बत्ती बनाले उस वत्ती को धागे से लपेट कर एक प्रहर तक तिल तैल में डूबो दें। फिर उसे संड़सी से बीच में पकड़ कर अग्नि से जलावें और नीचे एक काच का पात्र रख दें जिसमें गन्धक द्रुत होकर बिन्दु २ कर के तैल के रूप में एकत्रित हो जायगा ॥ २९-३० ॥

अथ प्रयोगविधिः—
तां द्रुतिं प्रक्षिपेत्पत्रे नागवल्ल्यास्त्रिबिन्दुकाम् ॥
वल्लेन प्रमितं स्वच्छं सूतेन्द्रं च विमर्दयेत् ॥ ३१ ॥
मङ्गुल्याऽथ सपत्रां तां द्रुतिं सूतं च भक्षयेत् ।
करोति दीपनं तीव्रं क्षयं पाण्डु च नाशयेत् ॥ ३२ ॥
कासं श्वासं च शूलार्ति ग्रहणामतिदुर्घराम् ।
आमं विनाशयत्याशु लघुत्वं प्रकरोति च ॥ ३३ ॥

उस तैल स्वरूप गन्धक द्रुति के तीन बूंद और एक रत्ती भर रससिन्दूर ले के घोट कर दोनों को अङ्गुली से पान में मिला कर भक्षण करें। इस से अग्नि दीप्त होती है तथा तीव्र क्षय, पाण्डु, कास और श्वास ये रोग नष्ट हो जाते हैं, तथा शूल, दुःसाध्य ग्रहणी, आंव ये भी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। इसके सेवन करने से शरीर में लघुता उत्पन्न होती है ॥ ३१-३३ ॥

अथान्यविधप्रयोगविधिः—
घृताक्ते लोहपात्रे तु विद्रुतं शुद्धगन्धकम् ।
घृताक्तदर्विकाक्षिप्तं द्विनिष्कप्रमितं भजेत् ॥
हन्ति क्षयमुखान् रोगान्कुष्ठरोगं विशेषतः ॥ ३४ ॥

घृत से लिप्त लौह पात्र (कडाही) में शुद्ध गन्धक डालकर पिघलावें फिर उसे घृत से लिप्त कलच्छु से चलाते रहें। कुछ देर बाद नीचे उतार कर चूर्ण कर रख लें। इस गन्धक को एक निष्क (चार मासा) से दो निष्क की मात्रा में सेवन करने से कुष्ठ तथा क्षय रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ ३४ ॥

गन्धकसेवने वर्ज्यानि—
क्षाराम्लतैलसौवीरविदाहिद्विदलं तथा ।
शुद्धगन्धकसेवायां त्याज्यं योगयुतेन हि ॥ ३५ ॥

१००

रसरत्नसमुच्चये—

शुद्ध गन्धक का सेवन करने वाले मनुष्य क्षार (नोमक), अम्ल (निम्बू इ०), तैल और निस्तुष यव या गोधूमकृत काञ्जी (सौवीर), जलन कारक वस्तु या अम्ल-पाक वस्तु जैसे वंशकरीरादि और दो दल वाले मुद्गादि शमीधान्य त्याग दें॥३५॥

कुष्ठे गन्धकप्रयोगः—

गन्धकस्तुल्यमरिचः षड्गुणत्रिफलान्वितः ।
घृष्टः शम्पाकमूलेन पीतश्चाखिलकुष्ठहा ॥ ३६ ॥
तन्मूलं सलिले पिष्टं लेपयेत्प्रत्यहं तनौ ।
दृष्टप्रत्यययोगोऽयं सर्वत्राप्रतिवीर्यवान् ।
श्रीमत्ता ऽोमदेवेन सम्यगत्र प्रकीर्तितः ॥ ३७ ॥

शुद्ध गन्धक और मरिच चूर्ण समान भाग लेकर गन्धक से षड् गुण अधिक त्रिफला चूर्ण मिलाकर घोट लें । फिर इस चूर्ण को अमलतास की जड़ के क्वाथ या स्वरस के साथ पीने से सम्पूर्ण कुष्ठ नष्ट हो जाते हैं । इसी के साथ साथ अमलतास की जड़ को पानी में चन्दन की तरह घिस कर उसका शरीर पर लेप करना चाहिए । यह योग कुष्ठनाशन के लिये प्रत्यक्ष फलप्रद देखा गया है । इसके समान अन्य योग शान्तिप्रद नहीं है । यह सोमदेव ने बताया है॥३६-३७॥

अथ कण्डूहरप्रयोगः—

द्विनिष्कप्रमितं गन्धं पिष्ट्वा तैलेन संयुतम् ।
अथापामार्गतोयेन सतैलमरिचेन हि ॥ ३८ ॥
विलिप्यासकलं देहं तिष्ठेद् घर्मे ततः परम् ।
तक्रभक्तं च भुञ्जीत तृतीये प्रहरे खलु ॥ ३९ ॥
भजेद्रात्रौ तथा वह्निं समुत्थाय तथाप्रगे ।
महिषीछगणं लिप्त्वा स्नायाच्छीतेन वारिणा ॥ ४० ॥
ततोऽभ्यज्य घृतैर्देहं स्नायादिष्टोष्णवारिणा ।
अमुना क्रमयोगेन विनश्यत्यतिवेगतः ।
दुर्जया बहुकालीना पामा कण्डूः सुनिश्चितम् ॥ ४१ ॥
गन्धकस्य प्रयोगाणां शतं तन्न प्रकीर्तितम् ।
ग्रन्थविस्तारभीतेन सोमदेवेन भूभुजा ॥ ४२ ॥

दो निष्क (८ मासे) भर शुद्ध गन्धक का चूर्ण तथा इतना ही मरिचचूर्ण

तृतीयोऽध्यायः। १०९

लेकर दोनों को कटुतैल और अपामार्ग के जल के साथ घोट कर सम्पूर्ण शरीर में लेप कर धूप में खड़ा रहना चाहिए। तीसरे प्रहर में भूख लगने पर मट्ठा और भात का भोजन करें। रात्रि में अग्नि से देह को तपावें। दूसरे दिन उठ कर भैंस के गोबर का शरीर पर लेप कर शीत जल से स्नान करें। पश्चात् समग्र शरीर पर घृत की मालिश कर मन्दोष्ण जल से स्नान करें। इस तरह इस प्रयोग का कुछ दिन सेवन करने से शीघ्र ही बहुकालीन तथा असाध्य पामा, और कण्डू निश्चय ही नष्ट हो जाती हैं। इस तरह के गन्धक के सैकड़ों प्रयोग हैं उनका ग्रन्थ विस्तार होने के भय से महाराज सोमदेव ने नहीं वर्णन किया है ॥३८-४२॥

अथ गन्धकतैलम्— अथवाऽर्कस्नुहीक्षीरैर्वस्त्रं लेप्यन्तु सप्तधा । गन्धकं नवनीतेन पिष्ट्वा वस्त्रं लिपेद्धनम् ॥ ४३ ॥ तद्वर्तिं ज्वलितां दंशे धृतां कुर्यादधोमुखीम् । तैलं पतेदधोभाण्डे ग्राह्यं योगेषु योजयेत् ॥ ४४ ॥

किसी स्वच्छ वस्त्र को सेंहुड़ के दुग्ध से लिप्त कर सुखा लें। इस तरह सात बार सुखावें, पश्चात् सात बार ही उस वस्त्र को मदार के दुग्ध से लिप्त कर सुखालें। फिर शुद्ध गन्धक को मक्खन या घृत में पीस कर उसका वस्त्र पर गाढ़ा लेप कर वस्त्र की बत्ती बना लें। उस बत्ती को संड़सी से पकड़ कर जलावें, फिर उसका एक मुख नीचे रखे पात्र की ओर कर देना चाहिए। इस तरह तैल नीचे के पात्र में गिरेगा। उसेसब कामों में (रोगनाशार्थ) ग्रहण करें ॥ ४३-४४ ॥

शुद्धगन्धकगुणाः— अग्निकारी महानुष्णो वीर्यवृद्धिं करोति च ॥ ४५ ॥

इति गन्धकाधिकारः—

शुद्ध गन्धक कुष्ठ रोग तथा जरा और मरण (अकाल मृत्यु) को नष्ट करता है। यह पाचकाग्नि को दीप्त करता है। उष्ण वीर्य तथा वीर्य अर्थात् शरीर शक्ति को बढ़ाता है ॥ ४५ ॥

अथ गन्धकीयविमर्शः— गन्धक ( Sulphur ) सल्फर । इस मूलतत्त्व ( Element ) का ज्ञान सांसारिक प्राणियों को कब से है, इसके