रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८ रसरत्नसमुच्चये-
प्रायः बिस्मथ आक्साइड ( Bismuth oxide Bi ₂ S ₂ ) और बिस्मथ तथा बिस्मथ सल्फाईड ( Bismuth sulphide बिस्मथ ग्लांस Bi ₂ S ₂ ) । इन दो प्रधान खनिजों से होती है तथा टङ्गस्टेन और वङ्ग के खनिजों के साथ भी थोड़ी मात्रा में बिस्मथ पाया जाता है ।
बिस्मथ की उपलब्धि बिस्मथ आक्साइड ( Bismuth oxide ) को कोयलों के साथ गरम करने से आक्साइड लघ्वीकृत हो बिस्मथ मुक्त हो जाता है तथा द्रव अवस्था में बह कर कोयले से पृथक् हो जाता है ।
यह क्रिया इस प्रकार होती है । ₂ Bi ₂03+C=4 Bi+3 co 2
गुण—बिस्मथ भूरे रङ्ग की रक्त आभा ली हुई क्रिस्टलीय धातु है । यह कठोर और भङ्गुर होती है । इस में चमकीली धातुकद्युति होती है । इस का विशिष्ट घनत्व ७८ होता है । यह ७०° से० पर के तापक्रम पर पिघलती है ।
यह वायु या आक्सिजन से आक्रान्त नहीं होती है परन्तु तीव्र आंच से वायु में आक्साइड के रूप में परिणत हो जाती है । तनु गन्धकाम्ल और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल की भी इस पर कोई क्रिया नहीं होती है । तप्त गन्धकाम्ल से यह बिस्मथ सल्फेट ( Bi 2 so 4 ) 3 और सल्फर डाई-आक्साइड ( Sulphur Di oxide ) में परिणत हो जाता है । तनु अथवा समाहृत नाइट्रिक अम्ल से यह शीघ्रता से आक्रान्त होकर बिस्मथ नाइट्रेट बनती है और नाइट्रोजन का आक्साइड मुक्त करती है ।
बिस्मथ का उपयोग—आज कल इस का स्टीरियो टाइप में अधिक प्रयोग होता है तथा निम्न तापक्रम पर पिघलने वाली अनेक धातुओं के निर्माण में प्रयुक्त होती है । बिस्मथ के अनेक आक्साइड होते हैं । उन में बिस्मथ ट्राइ-आक्साइड् और बिस्मथ पेण्टाक्साइड मुख्य हैं । बिस्मथ का सल्फाईड प्रकृति में भी पाया जाता है और कृत्रिम रीति से भी तैयार हो सकती है । बिस्मथ के सामान्य नाइट्रेट और भास्मिक नाइट्रेट होते हैं । इसका पाश्चात्य चिकित्साशास्त्र में उदर रोग और उपदंश आदि में विशेष प्रयोग होता है । किन्तु हमारे चिकित्सक इसका प्रयोग नहीं करते हैं । वैद्य बन्धुओं को इसका प्रयोग कर के लाभ उठाना चाहिए ।
अथ गुणाः— चपलो लेखनः स्निग्धो देहलोहकरो मतः । रसराजसहायः स्यात्तिक्तोष्णमधुरो मतः ॥ १३७ ॥ चपलः स्फटिकच्छायः षडस्रः स्निग्धको गुरुः । त्रिदोषघ्नोऽतिवृष्यश्च रसबन्धविधायकः ॥ १३८ ॥