भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

द्वितीयोऽध्यायः। ८९

महारसेषु कैश्चिद्धि चपलः परिकीर्तितः ॥ १३९ ॥

चपल धातु लेखन (मोटे शरीर को पतला करना) तथा स्निग्ध है और शरीर को लौह समान दृढ करती है। पारद के साथ मिलाने से अधिक गुण प्रद और स्वाद में तिक्त मधुर तथा उष्ण प्रकृति वाली है। चपल श्वेत पाषाण या फिटकरी के सदृश और षट् कोण युक्त होती है। यह स्निग्ध, गुरु, त्रिदोषनाशक, अत्यन्त वृष्य और पारद बन्धन करती है। कुछ विद्वानों की सम्मति है कि महा रसों में चपल की भी गणना है ॥ १३७-१३९ ॥

अथ शोधनम्— जम्बीरकर्कोटकाशृङ्गवेरैर्विभावनामिश्चपलस्य शुद्धिः ॥१४०॥

चपल धातु को चूर्ण करके निम्बू, वन्ध्या कर्कोटकी तथा आर्द्रक के रस की सात भावना देने से शुद्ध हो जाती है ॥ १४० ॥

अथ सत्त्वपातनम्— शैलं तु चूर्णयित्वा तु धान्याम्लोपविषैर्विषैः ।
पिण्डं बध्वा तु विधिवत्पातयेच्चपलं तथा ॥ १४१ ॥
इति चपलाधिकारः ।

चपल को काञ्जी, विष तथा उपविष के क्वाथों की भावना देकर (अर्थात् इन से घोटकर) गोला बना कर मूषा में फूंकने से सत्व निकल जाता है ॥ १४१ ॥

अथ रसकः— रसको द्विविधः प्रोक्तो दर्दुरः कारवेल्लकः ।
सदलो दर्दुरः प्रोक्तो निर्दलः कारवेल्लकः ॥ १४२ ॥

रसक अर्थात् खर्पर दो प्रकार का होता है। जो पत्ररूप रचना वाला होता है उसे दर्दुर कहते हैं और जिसमें पत्र रचना नहीं होती है उसे कारवेल्लक कहते हैं ॥ १४२ ॥

**विमर्शः—**रसक को खर्पर कहते हैं तथा इसका अङ्गरेजी नाम स्मिथ सोनाइट (Smithsonite) तथा केलेमाइट (Calamite) है। प्राचीन रस शास्त्र में जो इसके दो भेद (रसको द्विविधः प्रोक्तो दर्दुरः कारवेल्लकः) किये गये हैं उनमें कारवेल्लक खर्पर के लक्षण स्मिथ सोनाइट के साथ तथा दर्दुर खर्पर के लक्षण केलोमाइट के साथ मिलते जुलते हैं। प्रथम जिङ्क सिलिकेट है तथा द्वितीय जिङ्क कार्बोनेट है।