रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें९२ रसरत्नसमुच्चये-
अथ मतान्तरम्- साभयाजतुभूनागनिशाधूमजटङ्कणम् । मूकमूषागतं ध्मातं शुद्धं सत्त्वं विमुञ्चति ॥ १५४ ॥ अथवा हरीतकी, लाक्षा, केंचुआ ( अर्थवर्म ), हरिद्रा, घर का धुंआं, सुहागा, इन सबको खर्पर से चतुर्थांश भाग की मात्रा से लेकर खर्पर चूर्ण को मूकमूषा में रख कर फूंकने से सत्त्व निकल जाता है ॥ १५४ ॥
अथ मतान्तरम्- लाक्षागुडाऽऽसुरीपथ्याहरिद्रासर्जटङ्कणैः । सम्यक् सञ्चूर्ण्य तत्पक्वं गोगुग्धेन घृतेन च ॥ १५५ ॥ वृन्ताकमूषिका मध्ये निरुध्य गुटिकाकृतम् । ध्मात्वा ध्मात्वा समाकृष्य ढालयित्वा शिलातले । सत्त्वं वङ्गाकृति ग्राह्यं रसकस्य मनोहरम् ॥ १५६ ॥ अथवा लाक्षा, गुड़, राई ( राजिका ) हरड़, हल्दी, राल और टङ्कण इनका चूर्णकर खर्पर के साथ घोटें । फिर गोघृत और दुग्ध से पका कर गोला बनालें । फिर उस गोले को वृन्ताक मूषा में रखकर उसका मुख बन्द कर फूंकें । पश्चात् किसी पत्थर पर मूषा को ढालने से वङ्ग के समान सुन्दर सत्त्व निकल आता है ॥ १५५-१५६ ॥
अथ मतान्तरम्- यद्वा जलयुतां स्थालीं निखनेत्कोष्ठिकोदरे । सच्छिद्रं तन्मुखे मल्लं तन्मुखेऽधोमुखीं क्षिपेत् ॥ १५७ ॥ मूषोपरि शिखित्रांश्च प्रक्षिप्य प्रधमेद्द्रुढम् । पतितं स्थालीकानीरे सत्त्वमादाय योजयेत् ॥ १५८ ॥ अथवा एक हांडी में जल भर कर उसे जमीन में गाड़ देवे । उस स्थाली के मुख पर छिद्र वाला एक सकोरा रख दें । उस सकोरे पर मूषा का ख वाला भाग रख कर मूषा पर कोयले डालकर अग्नि पर फूके । खूब प्रधमन करने से मूषा के मुख से सत्त्व निकल कर हाण्डका के जल में गिर जायगा । उसको लेकर औषधियों के कार्य में प्रयोग करना चाहिए ॥ १५७-१५८ ॥