भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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द्वितीयोऽध्यायः। ९३

अथ सत्त्वमारणम्—

तत्सत्त्वं तालकोपेतं प्रक्षिप्य खलु खर्परे ।
मर्दयेल्लोहदण्डेन भस्मीभवति निश्चितम् ॥ १५९ ॥

खर्पर सत्त्व को कड़ाही में डाल कर उसमें समान मात्रा से हरताल डाल कर अग्नि पर रख दे और लौह के दण्ड से चलाता रहे। इस तरह खर्पर सत्त्व की भस्म हो जाती है ॥ १५९ ॥

अथ प्रयोगविधिः—

तद् भस्म मृतकान्तेन समेन सह योजयेत् ।
अष्टगुञ्जामितं चूर्णं त्रिफलाक्वाथसंयुतम् ॥ १६० ॥
कान्तपात्रस्थितं रात्रौ तिलजप्रातवापकम् ।
निषेवितं निहन्त्याशु मधुमेहमपि ध्रुवम् ॥ १६१ ॥
पित्तं क्षयं च पाण्डुं च श्वयथुं गुल्ममेव च ।
रक्तगुल्मं च नारीणां प्रदरं सोमरोगकम् ॥ १६२ ॥
योनिरोगानशेषांश्च विषमांश्च ज्वरानपि ।
रजःशूलं च नारीणां कासं श्वासञ्च हिध्मिकाम् ॥ १६३ ॥

इति रसकाधिकारः।
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये रसोत्पत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

खर्पर सत्त्व की भस्म को समान कान्तलौह भस्म के साथ मिला दें। इसमें से ८ रत्ती (गुञ्जा) लेकर एक कान्त लौह के पात्र में डालकर उसमें त्रिफला क्वाथ पूर्णमात्रा में भर दें, रात भर पड़ा रख कर प्रातःकाल इसमें कुछ तिलों का क्षार डाल कर सेवन करने से मधुमेह (डायबेटिज्), पित्त के रोग, क्षय, पाण्डु, शोथ, गुल्म, स्त्रियों का रक्तगुल्म, प्रदर और सोमरोग, सम्पूर्ण योनिरोग, विषम ज्वर (मलेरिया), रजःप्रवृत्तिकालीन शूल, कास, श्वास हिवकी आदि अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं ॥ १६०–१६३ ॥

इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा विरचितायां रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकायां रसोत्पत्तिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥