भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

पृष्ठ 174, कुल 362 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 174

८४ रसरत्नसमुच्चये—

अथ कर्पूरशिलाजतुनो लक्षणादिकम्—

पाण्डुरं सिकताकारं कर्पूराद्यं शिलाजतु ।
मूत्रकृच्छ्राश्मरीमेहकामलापाण्डुनाशनम् ॥ ११७ ॥
एलातोयेन सम्भिन्नं सिद्धं शुद्धिमुपैति तत् ।
नैतस्य मारणं सत्त्वपातनं विहितं बुधैः ॥ ११८ ॥
इति शिलाजित्त्वधिकारः ।

कर्पूर गन्धवाली शिलाजीत पाण्डुवर्ण तथा वालू के आकार की होती है । इस के सेवन से मूत्रकृच्छ्र, अश्मरी, प्रमेह, कामला और पाण्डुरोग नष्ट होता है । इस की शुद्धि इलायची के काथ में घोटने से होती है । आयुर्वेद के विद्वानों ने इसका मारण और सत्त्व पातन का विधान नहीं कहा है ॥ ११७-११८ ॥

अथ सस्यकः —

अथ सस्यकोत्पत्तिवर्णनम्—

पीत्वा हालाहलं वान्तं पीतामृतगरुत्मता ।
विषेणामृतयुक्तेन गिरौ मरकताह्वये ।
तद्वान्तं हि घनीभूतं सञ्जातं सस्यकं खलु ॥ ११९ ॥

किसी समय अमृत पान किये हुए गरुड़ जी ने हालाहल नामक विषका पान कर लिया । इस कारण अमृत और हालाहल विष के एकत्र होने से मरकत नामक पर्वत पर उन्हें वमन होगई । कुछ समय के पश्चात् वह वमन पदार्थ घन स्वरूप होकर नील तुत्थ के रूप में परिणत होगया ॥ ११९ ॥

प्रशस्तसस्यकलक्षणम्—

मयूरकण्ठसच्छायं भाराढ्यमतिशस्यते ॥ १२० ॥
द्रव्यं विषयुतं यत्तद्द्रव्याधिकगुणं भवेत् ।
सुधाहलाहलैर्युक्ता सुधाधिकगुणा तथा ॥ १२१ ॥

जो नील तुत्थ ( सस्यक ) मयूर के कण्ठ के समान नील वर्ण और भार युक्त हो वह औषध कर्म में अत्यन्त श्रेष्ठ है । किसी द्रव्य में विष मिल जाने से उस के गुण बढ़ जाते हैं । इसी तरह हालाहल विष से युक्त सुधा भी सुधा (अमृत) से भी अधिक गुण प्रद हो जाती है ॥ १२०-१२१ ॥