रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८६ रसरत्नसमुच्चये—
नीलतुत्थ चूर्ण के साथ चौथाई भाग की मात्रा में सुहागा मिला कर घोटेँ । फिर उसको करञ्ज के तैल में एक दिन तक भिगो दे । तदनन्तर उसका गोला बनाकर अन्धमूषा में बन्दकर वैर (बदरी) काष्ठ के कोयलों की अग्नि में तीन दिन तक फूंकने से इन्द्रगोप (बीर बहूटी) के समान सुन्दर लालवर्ण का सत्व प्राप्त होता है॥ १२७॥
अथ मतान्तरम्—
निम्बुद्रवालपटङ्काभ्यां मूषामध्ये निरुध्य च ।
ताम्ररूपं परिध्मातं सत्वं मुञ्चति सस्यकम् ॥ १२८ ॥
शुद्धं सस्यं शिखिक्रान्तं पूर्वभेषजसंयुतम् ।
नानाविधानयोगेन सत्त्वं मुञ्चति निश्चितम् ॥ १२९ ॥
अथवा नीलतुत्थ चूर्ण के साथ कुछ टङ्कण (सुहागा) मिलाकर निम्बू के रस से घोट कर गोला बनावै । पश्चात् मूषायन्त्र में बन्दकर फूंकने से ताम्र के समान लाल वर्ण का सत्व प्राप्त होता है । शुद्ध नील तुत्थ चूर्ण को सत्त्वपातन कराने वाली पूर्वोक्त औषधियों के साथ मिला कर भिन्न २ सत्त्वपातन की विधियों द्वारा अग्नि देने से सत्व प्राप्त हो जाता है ॥ १२८-१२९ ॥
अथ प्रयोगविधिः—
सत्त्वमेतत्समादाय खरभूनागसत्त्वयुक् ।
तन्मुद्रिका कृतस्पर्शा शूलघ्नी तत् क्षणाद्भवेत् ॥ १३० ॥
चराचरं विषं भूतडाकिनीदृग्गतं जयेत् ।
मुद्रिकेयं विधातव्या दृष्टप्रत्ययकारिका ॥ १३१ ॥
नील तुत्थ का सत्व, दुरालभा और केंचूए (अर्थ वर्म) का सत्व इन को मिला कर अंगूठी बनवावे । इस के स्पर्श मात्र से शीघ्र ही शूल नष्ट हो जाता है । किसी पुस्तक में खर के स्थान में कर्ष शब्द लिखा है उस मत से एक कर्ष केंचूए का सत्व लेना चाहिए, दुरालभा नहीं लेवें । इस अंगूठी के प्रभाव से स्थावर और जङ्गम विष तथा भूत, प्रेत और डाकिनियों की दृष्टि से उत्पन्न बाधाएं दूर हो जाती हैं तथा यह मुद्रिका प्रत्यक्ष विश्वास पैदा कराने वाली है ॥ १३०-१३१ ॥
अथ भालुकितन्त्रोक्तप्रयोगविधिः—
रामवत्स्रोमसेनानीर्मुद्रितेऽपि तथाऽक्षरम् ।
हिमालयोत्तरे पार्श्वे अश्वकर्णो महाद्रुमः ।