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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 139 of 799

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Page 139

७ पञ्चमस्तरङ्गः ६७ रसशास्त्रामिज्ञैः रसगुणबलिजारणाविहीनः षड्गुणगन्धकजारणाविरहितः अत्र “रसगुणबलिजारणं विनाऽयं न खलु रुजाहरणक्षमो रसेन्द्रः। न जलदकलधौत- पाकहीनः स्पृशति रसायनतामिति प्रतिज्ञा ॥” इति प्राचीनोक्तिरप्यनुसन्धेया॥१००-१ भा. टी.—पारद में बालुकायन्त्र, कच्छपयन्त्र, जारणायन्त्र आदि यन्त्रों के द्वारा गन्धक आदि द्रव्यों का जारण (जीर्ण) करने को जारण संस्कार कहा जाता है ॥ १०० ॥ पारद चाहे अष्टसंस्कार से शुद्ध किया हो अथवा हिंगुल से निकाला गया. हो; परन्तु यदि वह छः गुना गन्धक-जीर्ण न किया हो तो उसमें रोगनाशक शक्ति पूर्णरूप से नहीं आती है । अतः पारद में षड्गुण गन्धकजारण अवश्य करना चाहिए जिससे उसमें रोगनाशक शक्ति उत्पन्न हो जाय ॥ १०१ ॥ षड्गुणबलिजारणस्य प्रथमः प्रकारः निधाय बालुकायन्त्रे चषकं सुदृढं भिषक् । रसतुल्यं बलिं तस्मिन्निक्षिपेत् खलु शोधितम् ॥ १०२ ॥ बलिं तु विद्रुतं दृष्ट्वा रसेशं तत्र दापयेत् । अर्द्धजीर्णं बलिं ज्ञात्वा पुनर्गन्धं प्रदापयेत् ॥ १०३ ॥ आषड्गुणं क्षिपेदेवमल्पमल्पं समाहितः । स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा रसेशं तु समाहरेत् ॥ १०४ ॥ अथ षड्गुणगन्धकजारणास्याद्यः प्रकारः—अर्द्धगन्धके जीर्णे पुनर्गन्धकं प्रदापयेत्, सर्वगन्धकक्षये पारदस्योड्डयनभयात् । अत एव च किञ्चित् गन्धक- शेष एव उत्तारणमस्य विधेयम् ॥ एवं षड्गुणगन्धकक्षयपर्यन्तमल्पमल्पं पुनः पुनर्द्यादिति प्रथमः कल्पः ॥ १०२–१०४ ॥ भा. टो.—षड्गुण गन्धकजारण करने के लिए बालुकायन्त्र के ऊपर एक मिट्टी अथवा लोहे का प्याला रखें, अब उसमें पहिले पारद समभाग शुद्ध गन्धक डाल दें । जब गन्धक पिघल जाय तो उसमें गन्धक के बराबर भाग शुद्ध पारद डाल दें और अग्नि देते जायँ। जब पहिले का गन्धक आधा जीर्ण हो जाय तो उसमें फिर पारद के बराबर भाग गन्धक डालें। इस क्रम से थोड़ा- थोड़ा करके छःगुना गन्धक उसमें डालकर जीर्ण कर लें ॥ १०२–१०४ ॥ षड्गुणबलिजारणस्य द्वितीयः प्रकारः कच्छपाख्येन यन्त्रेण रसत्तन्त्ररहस्यवित् । उक्तमार्गानुसारेण जारयेत् षड्गुणं बलिम् ॥ १०५ ॥