रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context१३४ रसतरङ्गिणी लावतित्तिरिकादीनां रसं तत्र नियोजयेत् । अतीसारनिरोधे तु दुग्धमेव प्रदापयेत् ॥१५८॥ शोथे विशेषतो हेयं पानीयं लवणन्तथा । तृषायां वितरेदल्पं नारिकेलोदकं भिषक् ॥१५९॥ उष्णप्रधानदेशे तु रोगिमङ्गलकाम्यया । सशोथेऽपि भिषङ् नीरं जातु नैव विवर्जयेत् ॥१६०॥ अतीसारनिरोधे अतीसारे निवृत्ते सति ॥ १५६-१६० ॥ भा.टी.—अन्नों में पुराने चावल, शाकों में परवल, तथा कोमल बैंगन, गोदूध, ये चार चीजें पर्पटी सेवन में निरन्तर पथ्य समझनी चाहिये । यदि पर्पटी सेवन करने पर प्रारम्भ अवस्था में दूध अनुकूल न पड़े और दूध पीने से दस्त अधिक होने लगें तो इसे छोड़ देना चाहिये । इसके स्थान पर रोगी की बलवृद्धि के लिये लावा और तीतर आदि पक्षियों के लघुमांस रस का प्रयोग करना चाहिये । यदि पर्पटी सेवन करनेवाले रोगी के शरीर में शोथ हो तो उसे जल तथा नमक नहीं देना चाहिये । यदि उसे तृषा लगती हो तो पीने के लिये थोड़ा थोड़ा नारियलजल देते रहना चाहिये । किन्तु अधिक गरम देशों में रोगी के हित की दृष्टि से शोथ होने पर तृषा में जल का निषेध नहीं करना चाहिये; अन्यथा रोगी को मूर्च्छा आदि विकार होने की आशंका रहती है ॥ १५६–१६० ॥ रसपर्पटिकाया अपथ्यानि नाम्लं स्नानं शिशिरसलिलैर्नापि वातादिसेवां कोपं चिन्तामहिममतुलं नैव सेवेत चोष्णम् । तिक्तं निम्बादिकमिह गुडानूपमांसादिकञ्च स्त्रीणां सम्भाषणमपि बुधैर्नैव कार्यं कदाचित् ॥१६१॥ भा. टी.—रसपर्पटी सेवनकाल में रोगी को अम्ल द्रव्यों का सेवन, शीत जल से स्नान, शीत वायु में रहना या घूमना, क्रोध करना, चिन्ता करना, तथा उष्ण द्रव्यों का सेवन सर्वथात्याग देना चाहिये । इसके अतिरिक्त नीम आदि कड़वी चीजों का सेवन गुड़, अनूपदेशीय जन्तुओं का मांस आदि तथा स्त्रियों के साथ एकान्त में हास्य और शृंगार सम्बन्धी बातचीत कदापि नहीं करनी चाहिये ॥ १६१ ॥