रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextषष्ठस्तरङ्गः १३५ अथ रससिन्दूरस्य निर्माणप्रकारः तोलकाष्टकमितं रसेश्वरं तन्मितञ्च विमलं बलिं हरेत् । खल्वके खलु विमर्द्य कज्जलीं भावयेदथ वटाङ्कुराम्बुभिः ॥१६२॥ मषीपात्रसमाकारां सुकृष्णां काचकूपिकाम् । सतूलकुट्टितमृदा लेपयेत् खलु यत्नतः ॥१६३॥ स्थापयेत्कज्जलीं काचकुप्यां ततो यत्नतः पाचयेद्वालुकायन्त्रगाम् । अग्निवृद्धिक्रमैम्र्जीर्णगन्धे रसे रोधयेद्युक्तितः काचकूपीमुखम् ॥१६४॥ वालुकायन्त्रके काचकूपीमुखात् रोचनासन्निभो नैति धूमो यदा । सूतपाकक्रियाज्ञानदत्तैर्बुधैर्वेदितव्यस्तदा जीर्णगन्धो रसः ॥१६५॥ निवेश्य कुप्यां खटिकाविधानं जलेन सम्पेषितया प्रकामम् । प्रलेपयेद्वै गुडचूर्णपिष्ट्या ततः पचेद्यामयुगं रसज्ञः ॥१६६॥ अवबुध्य तदंगशीततां खलु बालारुणसूर्यसन्निभम् । गलदेशविलग्नमुज्ज्वलं रससिन्दूरमिहाहरेद् बुधः ॥१६७॥ अथ रससिन्दूरनिर्माणप्रकारः—रसः ८ तोलकः, गन्धकः ८ तोलकः, कज्ज- लीकृत्य वटांकुरजलैर्भावयेत्। रोचनासन्निभः पीतवर्ण इत्यर्थः। अयञ्च बहिर्धूमजा- रणप्रकारः, अन्तर्धूमनिर्माणप्रकारोपयोगि बालुकायन्त्रन्तु पूर्वमवोचाम, तेन रससिन्दूरस्य तलस्थतापि भवति ॥ १६२-१६७ ॥ भा. टी—आठ तोला शुद्ध पारद और इतना ही शुद्धगन्धक लेकर इन दोनों को एकत्र खरल में डालकर अच्छी तरह कज्जली बना लें और इस कज्जली को बड़ के अंकुरों के जल से एक भावना देकर सुखा लें । अब एक दवात की तरह बनी हुई काले काँच की शीशी लेकर इसको रुई और मुलतानी मिट्टी को एकत्र कूटकर इससे अलग-अलग साफ कपड़मिट्टी करके सुखा लें । अब पूर्वोक्त कज्जली को इस काँच की शीशी में भरकर इसे वालुकायन्त्र में रखें और मन्द, मध्य तथा तीव्र क्रम से अग्नि देते हुए गन्धक के जल जाने पर शीशी के मुख में सावधानी से डाट लगा दें । वालुकायन्त्र में रखी हुई शीशी के मुख से जब रोचन सदृश वर्ण अर्थात् पीतरक्तमिश्रित वर्ण का धुआँ निकलना बन्द हो जाय तो 'गन्धक जीर्ण हो गया है' ऐसा समझकर उसी समय शीशी के मुख में डाट लगाना चाहिये । शीशी के मुख में खड़िया या ईंट का बना हुआ डाट लगाकर उसको गुड़ तथा चूने के जल से पीसकर लेप करके फिर ६ घंटे की अग्नि देवें । जब अग्नि बन्द करने पर वालुकायन्त्र स्वतः