रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context१३६ रसतरङ्गिणी शीत हो जाय तो शीशी को निकाल खोलकर उसके गले में लगा हुआ प्रातः काल के सूर्य के समान रक्तवर्ण का रससिन्दूर निकालें। वक्तव्य—वालुकायन्त्र की हाँडी के पेंदे में एक कनिष्ठिका अंगुली के समान छिद्र करके उसमें शीशी रखकर फिर वालुका भरने का भी कई वैद्य विधान मानते हैं। और कई हाँडी के छिद्र में भीतर की तरफ पहिले एक अभ्रक का पात्र रखकर उस पर शीशी रख वालुका भरने को कहते हैं। इन दोनों का अभिप्राय तीव्र अग्नि पहुँचाने से है, परन्तु गन्धक जीर्ण होने पर ही डाट लगाना उचित होने पर उक्त विधान को न भी किया जाय तो कोई हानि नहीं होती है। शीशी के स्थान पर काली बोतल लेना उत्तम होता है ॥१६२–१६७॥ रससिन्दूरस्य निर्माणप्रकारः [ गीतिका ] वसुतोलकप्रमाणं विमलीकृतं रसेशम्। विनिधाय खल्वमध्ये रससंमितञ्च गन्धम् ॥१६८॥ दिवसद्वयं प्रयत्नादिह पेषयेद्भिषज्ञः। नवनीलनीरदाभां खलु कज्जलीं विदध्यात् ॥१६९॥ अथ भावयेद्विधानात्तु वटाङ्कुरोत्थवारि। लघुशाल्मलीशिफोत्थैः सलिलैस्तु वा त्रिवारम् ॥१७०॥ मासपात्रकोपमाङ्गीं मलिनां तु काचकूपीम् । जलतूलमृत्तिकाभिः परिलेपयेन्निकामम् ।१७१। विनिधाय तां तु कूप्यामथ वालुकाख्ययन्त्रे । क्रमवृद्धवह्नियोगाद्विपचेद्रसं रसज्ञः ॥१७२॥ मृदुवह्निना च पूर्वं विबुधो द्वियाममात्रम् । विधिना विधानविज्ञः खलु जारयेत्तु गन्धम् ॥१७३॥ अवलोक्य जीर्णगन्धं रसपाकविद्रसेशम् । पिदधीत काचकूपोवदनं पिधानकेन ॥१७४॥ गुडचूर्णवारिपिष्ट्या सुविधाय वक्त्ररोधम् । अथ तीव्रवह्नियोगाद्विपचेद् द्वियाममात्रम् ॥१७५॥ स्वत एव शीतलाङ्गीं तु विभिद्य काचकूपीम् । अरुणोत्पलप्रकाशं रसमाहरेद्रसज्ञः ॥१७६॥