रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context१४६ रसतरङ्गिणी अथ प्रसङ्गात् रोगयोग्यः प्रयोगोऽस्य वर्ण्यते जातपुष्पेति—पुष्पितवृक्षस्य पत्राणामपूर्णवीर्यत्वात् जातपुष्पायाः तुलस्याः पत्ररसो ग्राह्यः, नागिनी ताम्बू- लवल्ली। छिन्नोद्भवा गुडूची, कान्ताललाटाभरणां रससिन्दूरम्। योषित्प्रिया हरिद्रा। बालाभया क्षुद्रहरीतकी । दार्वी दारुहरिद्रा । शिलाजं शिलाजतु । पुरूहूतफल इन्द्रयवः । चन्द्रः कर्पूरम्, चातुर्जातकं त्वगेलापत्रकेसरम् । तमस्ततिमन्धकारपट- लानि । वयस्या हरीतकी, कालिपादपः विभीतकः, जन्तुरिपुः विडङ्गः । मिशिः शतपुष्पा । नीरं बालकम् । रसा रास्ना। अब्दं मुस्ता। गुडूच्यादीनां मिश्रितानां मानं २ तो०, जलं ३२ तो०, शेषः क्वाथः ८ तो० इति परिभाषा। विदार्या- दिगणः सुश्रुतनिर्दिष्टः । गगनं अभ्रकम् । देवपुष्पं लवङ्गम् । जरणां जीरकम्, धान्येकं धान्याकम् । दीप्यकं यवानी, रुच्यकं सौवर्चलम् । पानात्ययं मदात्य- यम् । यव्यः यवक्षारः, पक्तिशूलं परिणामशूलम् । गेहनीरं काञ्जिकम् । वस्ति- कुण्डलं तदाख्यं मूत्राशयरोगम् । सुरसा तुलसी । उपलक्षणमात्रञ्चैतत्, वस्तु- तस्तु सहानुपानयोर्नास्ति नियमः, किन्तु यथारोगं देशकालव्यवस्थानुसारं सिद्ध- हस्तः क्रियाकुशलो वैद्यः कल्पयेदनुपानसहपाने ॥ २०३-२३४ ॥ भा.टी.—नव ज्वर में रससिन्दूर को योग्य मात्रा में लेकर फूलवाली तुलसी के पत्ररस के साथ अथवा अदरखरस के साथ अथवा पान के स्वरस के साथ प्रयोग करना चाहिये । जीर्ण ज्वर में रससिन्दूर का प्रयोग करना हो तो गिलोय, पितपापड़ा तथा धनिया इसके चतुर्थांश अवशेष क्वाथ के साथ देना चाहिये। प्रमेह में रससिन्दूर को गिलोय के स्वरस अथवा कच्ची ताजी हल्दी के स्वरस के साथ देना चाहिये । प्रदर रोग में इसको अशोक, खरेंटी, लोध्र आदि ग्राही और शोथहर द्रव्यों के कषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये । अर्श रोग में इसको छोटी हरड़ के कषाय के साथ प्रयोग करना चाहिये । अपस्मार में रससिन्दूर को वचचूर्ण के साथ सेवन करना चाहिये । उन्माद रोग में इसे पेठे के स्वरस ( जल ) के साथ प्रयोग करना चाहिये । श्वास रोग में बहेड़ाक्वाथ अथवा वासा ( अडूसा ) स्वरस के साथ रससिन्दूर का प्रयोग करना चाहिये । कामला रोग में रससिन्दूर को दारुहल्दी क्वाथ के साथ और पाण्डुरोग में इसे लौहभस्म के साथ सेवन करना चाहिये । विविध प्रकार के मूत्रकृच्छ्र रोगों में रससिन्दूर को मिश्री, छोटी इलायची-बीजचूर्ण, तथा शिलाजीत, प्रत्येक समभाग के साथ शीत दुग्धानुपान से सेवन करना चाहिये । अजीर्ण में इसको मधु के साथ और मुस्ताक्वाथ के साथ देना चाहिये । उदरशूल में इसको