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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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१५० रस्तरङ्गिणी यन्त्रेण तलस्थरससिन्दूरोक्तविधिनापि मकरध्वजः साध्यते। षड्गुणबलिजारणार्थं षड् वारं सप्तवारं वा पाकः कार्यः। प्रतिपुटं गन्धकः सम एव देयः। षड्वारं पुटनेन यदि सम्यक् पाको न स्यात्तदा सप्तमे पाके गन्धकमदत्त्वैव मृदुः पुटो देयः। गन्धकोऽत्र सर्पिर्गन्धिरपि न स्यात्। अनेन विधिना सम्पादितो मकरध्वजः सुवर्णगर्भो भवति। "सहकारसमप्रभं भङ्गे रक्तप्रतीकाशं पिष्टे रक्तोत्पलोपमं सौवर्णं मूर्च्छितं सूतम्" इति तस्य लक्षणं ज्ञेयम्। सहकारः आम्रः। मूर्च्छितमिति रसस्य बन्धभेदः, पूर्वोक्तलक्षणः ना अनेन इति छेदः। ना पुरुषः मकरध्वज- सन्निभः कामदेवसुल्यसुन्दरः इति निरुक्तिः। स्पष्टमन्यत्॥ २३८–२४४॥ भा.टी.—आगे लिखी हुई सुवर्णशोधन विधि के अनुसार शोधित स्वर्ण के सूक्ष्म कंटकवेधी पत्र एक तोला, और अष्टसंस्कारों से शोधित तथा गन्ध- जारित शुद्ध पारद आठ तोला लेकर इन दोनों को दृढ़ चिकने पाषाण खरल में डालकर खूब मर्दन करें। जब सोना पारे में मिल जाय तो इसमें सोलह तोला शुद्ध गन्धक मिलाकर इसकी कज्जली बना लें। इस कज्जली को लाल कपास के पुष्पस्वरस, कोमल अंकोला वृक्ष की मूलस्वरस, तथा कुमारीस्वरस में एक या दो दिन तक मर्दन करके भावना दें। अब कज्जली को अच्छी तरह सुखाकर सात कपड़मिट्टी की हुई एक दृढ़ काँच की शीशी में भरदें और वालुकायन्त्र में रखकर चूल्हे में बेल, खदिर, बेर आदि की सूखी लकड़ी की अग्नि देकर पकायें। सर्वप्रथम दोपहर तक मृदु अग्नि द्वारा पाक करें, फिर छः घंटे मध्यम अग्नि द्वारा पकावें, इसके बाद फिर ६ घंटे तीव्र अग्नि से पकायें। जब गन्धक का रोचनावर्ण धुआँ निकलना बन्द हो जाय तब शीशी के मुख में डाट लगाकर चूने और गुड़ से इसको बन्द करदें, फिर चूल्हे में ६ घंटे तक तीव्र अग्नि देवें। बाद जब वालुकायन्त्र में ही शीशी स्वतःशीत हो जाय तो शीशी को निकाल तोड़कर भीतर से तोड़ने में रक्त वर्ण और पीसकर देखने में रक्त कमल के वर्ण सदृश मकरध्वज को निकाल लें और शीशी के तल- प्रदेश में स्वर्णभस्म होगी उसे भी निकाल लें। क्योंकि इस औषधि के सेवन से ही मनुष्य कामदेव के समान सुन्दर शरीरवाला हो जाता है। अतः रस- शास्त्रज्ञों नें इसका मकरध्वज नाम दे दिया है॥ २३८–२४४॥ वक्तव्य—मकरध्वज की यह बहिर्धूमविधि है, इसमें स्वर्ण मकरध्वज से पृथक् कूपी तलप्रदेश में पाया जाता है जो देखने में भस्म हुआ सा रहता है, परन्तु शुद्ध रूप से भस्मीभूत नहीं होता। अतः इसको पुनः शुद्धरूप से भस्म करने के लिए पारद गन्धक की कजली के साथ पाँच-सात पुट (लघु) देकर