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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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ठीक भस्म कर लेना चाहिये । यदि मकरध्वज को अन्तर्धूम विधि से बनाया जाय तो इसमें स्वर्ण पृथक् न होकर मिश्रित रूप में ही होता है । यही अन्तर्धूम पाचित मकरध्वज वास्तव में गुणकारी होता है। यदि मकरध्वज को षड्गुण बलि- जारित बनाना हो तो इसे उक्तविधि से तीन या चार बार पकाना चाहिये । कई वैद्य पारद के समभाग शुद्ध गन्धक डालकर ६ बार पाक करते हैं और शीशी के तल प्रदेश में बची हुई स्वर्ण-भस्म को भी प्रत्येक बार मिला देते हैं । परन्तु अन्तर्धूम विधि से बनाने पर स्वर्ण प्रथम अथवा दूसरे पाक में ही मकरध्वज के साथ मिल जाता है और बहिर्धूम मकरध्वज की अपेक्षा कई गुणा अधिक शक्तिशाली होता है । अन्तर्धूम विधि के लिए अधोवालुकायन्त्र का वर्णन पहिले ही किया जा चुका है । अन्तर्धूमविधि शास्त्रों में पाई जाती है, किन्तु आज तक किसीने बनाया है ऐसा सुनने में नहीं आया । श्रीसिद्धमकरध्वजः पूर्वोक्तनिजमानाच्च कनकं चैच्चतुर्गुणम् । निर्दिष्टमानप्रमितौ भवतो रसगन्धकौ ॥२४५॥ पूर्ववद्भावयित्वापि पचेत्सिकतयन्त्रके । एवन्तु षड्गुणं गन्धं जारयेत्क्रमशो भिषक् ॥२४६॥ समर्पितो यतश्चायं सिद्धेभ्यः शूलपाणिना । ख्यातस्ततोऽयं जगति श्रीसिद्धमकरध्वजः ॥ २४७ ॥ अथ श्रीसिद्धमकरध्वजनिर्माणप्रकारः । पूर्वोक्तेति—पूर्वोक्तं स्वर्णपरिमाणं स्वर्णतोलकसम्मितमिति तस्माच्चतुर्गुणम् । अर्थात् स्वर्णं ४ तोलाः, पारदन्तु ८ तोलाः, गन्धकः १६ तोलाः, पूर्ववद् भावनं पाचनाञ्च । एवं षड्गुणगन्ध- कस्य ४८ तोलामितस्य जारणेन निष्पन्नो मकरध्वजः श्रीसिद्धमकरध्वजनाम्ना व्यवह्रियते । मकरध्वजगुणवर्णनं स्पष्टम् ॥ २४५–२४७ ॥ भा.टी.—यदि पूर्वोक्त मकरध्वज के निर्माणकाल में स्वर्ण एक तोले के स्थान पर चार तोला डाल दिया जाय, पारद आठ तोला तथा गन्धक सोलह तोला ही रहे, इसके सिवाय अन्य क्रियायें सब मकरध्वज के समान ही की जाँय, अर्थात् कपासपुष्परस आदि भावना, वालुकायन्त्र में पाक करते हुए मृदु, मध्य तथा तीव्र अग्नि प्रयोगादि सब पूर्ववत् करते हुए पारद में ६ गुणा गन्धक जारण क्रमशः किया जाय तो इसे सिद्धमकरध्वज कहा जाता है ।