रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context१५६ रसतरङ्गिणी चांडालिनीकन्दसंज्ञः काकमाची विदारिका । बला समन्तदुग्धा च जयन्ती हस्तिशुण्डिका ॥१०॥ रम्भा कोषातकी शुण्ठी शशिलेखा निशाद्वयम् । काकजङ्घा काकनासा सुरसा बहुपुत्रिका ॥११॥ आखुकर्णी ब्रह्मदण्डी दूर्वा च शरपुङ्खिका । चक्रमर्दो नीपकणा वर्षाभूः कटुतुम्बिका ॥१२॥ इन्द्रवारुणिका हंसपादी च शङ्खपुष्पिका । जाती मूर्व्वा च लज्वालुः सर्षपस्तिलपर्णिका ॥१३॥ वन्ध्यकर्कोटकी धूर्तो गुडूची गिरिकर्णिका । प्रसारिणी भृङ्गराजो रामठं सोमवल्लरी ॥१४॥ शोभाञ्जनः पलाशश्च मत्स्याक्षी यमचिञ्चिका । मण्डूकपर्णी ज्वलनः शेफाली मुसली वचा ॥१५॥ पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयं रसस्य मारको गणः । तत्तद्विधिप्रभेदेन सूतमारणसाधकः ॥१६॥ अथ पारदमारकगणः—सूर्य्यः अर्कः, सूर्य्यभक्ता "हुरहुर" इति ख्याता, समन्तदुग्धा सुधा, रम्भा कदली, शशिलेखा बाकुची, बहुपुत्रिका शतावरी, नीपं कदम्बः, कणा पिप्पली, वर्षाभूः पुनर्नवा, तिलपर्णी तिलसदृशपत्रा, गिरिकर्णिका श्वेतापराजिता, रामठं हिंगुः, ज्वलनः चित्रकः, शेफाली निगुण्डी ॥६-१६॥ भा.टी.—अपराजिता ( कोयला ), खेखसा, नाकुली, सहदेवी, लाख, पुनर्नवा, आक, हुलहुल, कलिहारी, मकोय, विदारीकन्द, खरेटी, थूहर, अरणी, हस्तिशुण्डी, कदली, कडुवीतरोई, सोंठ, बाकुची, हल्दी, दारुहल्दी, काक- जंघा, कौआठोड़ी, तुलसी, शतावर, मूषाकानी, ब्रह्मदण्डी, दूब, शरपोंका, चकवड़, कदम्ब, पिप्पली, श्वेतपुनर्नवा, कड़वीतुम्बी, इन्द्रायण, हंसपादी, शंखपुष्पी, चमेली, मूर्वा, छुईमुई, पीलीसरसों, वनतिल, बाँझककोड़ा, धतूरा, गिलोय, श्वेतापराजिता, प्रसारिणी, भाँगर्रा, हींग, सोमलता, सहंजना, ढाक, मछेछी, दोनों प्रकार की इमली, ब्राह्मी, चित्रक, संभालू , मुसली, वच—इन औषधियों को पूर्वाचार्यों ने पारदमारकगण कहा है । ये औषधियाँ अनेक विधियों से पारद भस्म करने में सहायक होती हैं ॥ ६-१६ ॥