रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextसप्तमस्तरङ्गः १५५ अथ मारणप्रकारः—प्रथमः—सुतरां अत्यर्थम् , मारकगणो वक्ष्यमाणः । द्रवेण स्वरसेन क्वाथेन वा नियतं अवश्यम् ॥ ५-६ ॥ भा. टी.—अच्छी तरह शुद्ध किया हुआ पारद दो पल और शुद्ध गंधक एक पल परिमाण में लेकर इनकी कज्जली करके इस कज्जली को आगे लिखे जानेवाले पारदमारकगण की औषधियों के रस से एक दिन अच्छी तरह मर्दन करें और सुखाकर मूषापुट में बन्द करके इस पुट की सन्धि को युक्ति- पूर्वक पूर्वकथित वह्नि-मृत्तिका से बन्द करके सुखा लें । अब इस मूषा को भूधरयंत्र में बंद करके पुट देवें तो शीघ्र ही इसकी भस्म हो जाती है ॥५–६॥ वक्तव्य—यदि मारकगण की औषधियों का स्वरस प्राप्त न हो सके तो उनका क्वाथ ले लेना चाहिये । इस प्रकार से बनी हुई पारदभस्म में यद्यपि मृतपारद के लक्षण पूर्ण रूप से नहीं मिलते हैं, फिर भी यह अत्यन्त उपयोगी औषधि बन जाती है । अथ वह्निमृत्स्नालक्षणम् खटी लवणकिट्टाढ्या महिषीदुग्धमर्दिता । वह्नितापसहात्यन्तं वह्निमृत्स्ना प्रकीर्तिता ॥ ७ ॥ मूषादीनां सन्धिलेपे वह्निमृत्स्ना प्रशस्यते । नागन्तुं क्षमते सूतो निरुद्धो वह्निमृत्स्नया ॥ ८ ॥ वह्निमृत्स्नालक्षणं खटीति । खटी—तदाख्या गौरमृत्स्ना, लवणं सैन्धवं, किट्टं मण्डूरम् । मर्दनं श्लक्ष्णतापर्यन्तम् । शिष्टं सुगमम् ॥ ७-८ ॥ भा.टी.—गौर वर्ण की खड़िया मिट्टी में समभाग सैन्धानमक, मण्डूर मिला भैंस के दूध से मर्दन करके रख लें । इसी को वह्निमृत्स्ना या वह्निमृत्तिका कहा जाता है । इस प्रकार बनाई हुई मिट्टी अत्यन्त तीव्र अग्नि को सहन कर सकती है । मूषा, पुट आदि के सन्धिलेप के लिए यह वह्निमृत्स्ना अत्यन्त उपयोगी है । इसके द्वारा बन्द किये हुए मूषा या संपुटों से पारद उड़कर बाहर नहीं निकल सकता है ॥ ७-८ ॥ अथ पारदस्य मारको गणः विष्णुक्रान्ता देवदाली सर्पाक्षी सहदेविका । लाक्षा पुनर्नवा सूर्यः सूर्यभक्ता च लांगली ॥६॥