रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextस्मादीनामपि ग्रहणम्। तथापि—"मारणं सर्वलोहानामुत्तमं रसभस्मना। मध्यमं मूलिभिः प्रोक्तमधमं गन्धकादिभिः॥" अम्बरसुधां विष्णुपदामृतं “औक्सीजन” इत्याख्यम् ॥ १–२ ॥ भा.टी.—पारद, अभ्रक, वैक्रान्त, हीरा आदि रस महारसों तथा स्वर्ण, रजत, ताम्र आदि धातुओं में गन्धक आदि द्रव्यों का मिश्रण करके विभिन्न प्रकार से पुटपाक आदि द्वारा उसके स्थूल कणों को सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में विभक्त करते हुए रोगनाशक शक्ति उत्पन्न करते हुए इसे भस्म कर लेना, अथवा पारद आदि द्रव्यों को गन्धक आदि द्रव्यों के साथ मिला उनका ओषजनीकरण (Oxidation) करके भस्म कर लेना मारण शब्द से कहा जाता है ॥१–२॥ अथ मृतपारदस्य लक्षणम् निर्धूमस्तेजसा हीनो गौरवेण समन्वितः। अङ्गारस्थापितो यश्च न प्रयाति विरूपताम् ॥ ३ ॥ न च लाघवमायाति चापल्यं विजहाति च। आधिव्याधिहरो यश्च मृतः सूतः स उच्यते ॥४॥ अथ मृतपारदलक्षणं निर्धूम इति—तेजसा हीनः चाकचक्यरहितः॥३-४॥ भा.टी.—जो पारदभस्म अग्नि में डालने पर धुआँ न देती हो, जिसमें चमक न हो, भार में गौरवयुक्त, जलते हुए कोयलों पर डालने से उसमें कोई परिवर्तन न आये, भस्म होने पर अपने पूरे तौल में हो और जिसमें चपलता न हो, और जिसमें उपयोग करने पर शारीरिक तथा मानसिक रोगनाशक शक्ति पूर्ण रूप से आ गयी हो उसे योग्य भस्म अथवा मृतपारद कहते हैं ॥३-४॥ अथ पारदमारणस्य प्रथमः प्रकारः सूतः पलद्वयमितः सुतरां विशुद्धः स्याद्गन्धकश्च विशदः पलसम्मितोऽत्र । द्रावेण मारकगणोक्तमहौषधानां सम्पेषयेद्दिवसमेकमिहामयज्ञः ॥ ५ ॥ मूषापुटे रसवरं विनिधाय युक्त्या सन्धिं विलिप्य खलु वह्निमृदा च कामम्। मूषां निधाय विपचेत् खलु भूधराख्ये यन्त्रे रसोऽथ नियतं मृतिमेति शीघ्रम् ॥६॥