रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context१५८ रसतरङ्गिणी कल्कीकृत्य पुनस्तेन मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् ॥ २३ ॥ अरिमेदः कृमिरिपुः द्रोणपुष्पीसुमं समम् । सञ्चूर्ण्य चूर्णमेतेषां मूषामध्ये निधापयेत् ॥ २४ ॥ काकोदुम्बरिकादुग्धे सूतं यत्नेन मर्दितम् । चूर्णोपरि तु संस्थाप्य पुनश्चूर्णं प्रदापयेत् ॥ २५ ॥ प्रलिप्य रसगोलञ्च मूषायां स्थापयेत्ततः । सन्धिलेपं ततः कुर्यादवश्यं वह्निमृत्स्नया ॥ २६ ॥ संशोष्य चातपे मूषां पुटेत् गजपुटे भिषक् । एकेनैव पुटनेवं रसो यातीह भस्मताम् ॥ २७ ॥ अरिमेदो विट्खदिरः, कृमिरिपुः विडङ्गः । अथ च सर्वत्र रसभस्मनिर्माणे यथायोग्यं मारकौषधप्रणमान्वते रसविदः ॥ २३-२७ ॥ भा.टी.—अपामार्ग के नूतन बीजों को लेकर उनका चूर्ण कर लें। फिर इस चूर्ण को जल से पीसकर गाढ़ा सा कल्क बनाकर उसकी दो मूषा बना लें। अब एक मूषा में दुर्गन्धित खदिर, वायविडंग, गूमाफूल, इन तीनों का समभाग चूर्ण भरकर इसके ऊपर, कठूमर के दूध में अच्छी तरह मर्दित किये हुए पारद की टिकिया रखकर फिर इसके ऊपर पूर्वोक्त खदिर आदि द्रव्यों का चूर्ण डाल दें और दूसरी मूषा से ढँक दें और वह्निमृत्स्ना से सन्धि के साथ सम्पूर्ण मूषा सम्पुट को लिप्त करके गोला सा बना लें। अब इस गोले को एक दूसरे मूषा सम्पुट में बन्द करके वह्निमृत्स्ना से इसका सन्धिलेप करके सुखा लें। फिर इसे गजपुट में रखकर पुट दें तो एके दिन में ही पारद की भस्म हो जाती है ॥ २३-२७ ॥ पारदमारणस्य पञ्चमः प्रकारः भुजङ्गवल्लीरसै रसेश्वरं विमर्दयेत् । ततश्च कर्कटीभवं सुपेषयेत्तु कन्दकम् ॥ २८ ॥ विधाय कल्कमुत्तमं क्षिपेद्रसं तदन्तरे । निधाय सम्पुटं पुटेत्पुटे तु वारणाह्वये ॥ २९ ॥ भुजङ्गवल्लरी ताम्बूलवल्ली, कर्कटी वन्ध्याकर्कोटी, यदाहुः-“नागवल्लीरसैर्मृष्टः कर्कोटीकन्दमध्यगः। मृन्मूषासम्पुटे पक्वः सूतोयात्येव भस्मताम्” इति ॥२८-२९॥ भा.टी.—पहिले पारद को पान के स्वरस के साथ मर्दन कर इसका गोला सा बना लें। अब बांझककोड़े के कंद को खूब मर्दन करके गाढ़ा सा कल्क बना