रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextलें। अब इस कल्क के बीच में उक्त पारदगोलक को रख गोला बना लें। फिर इसे एक दृढ़ सम्पुट में बन्दकर वह्निमृत्स्ना का लेप करके गजपुट में फूँक दें तो पारद को भस्म हो जाती है ॥ २८-२६ ॥ अथ पारदस्य ( अनुभूतः ) षष्ठो मारणप्रकारः काकोदुम्बरिकादुग्धैर्भावयेद्रामठं भिषक्। तत्कालेन पुनः प्राज्ञो मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् ॥३०॥ तद्दुग्धमर्दितञ्चैव सूतं तत्र विनिक्षिपेत् । मुद्रां कृत्वा सूतगोलं मृन्मूषायां निधापयेत् ॥३१॥ सन्धि विलेपयेद्वह्निमृत्स्नया चाथ शोषयेत् । पचेल्लघुपुटे सूतं स्वाङ्गशीतंसमुद्धरेत् ॥३२॥ मूषासन्धिं विलिख्याथ कालाञ्जनसमप्रभम् । लाघवादिगुणोपेतं गृह्णीयाद् भस्मसूतकम् ॥३३॥ तद्दुग्धमर्दितम् काकोदुम्बरिकादुग्धमर्दितम् , उक्तं हि—"काकोदुम्बर- दुग्धैर्यत्नाद्दिभावितो हिंगुः । मर्दनपुटनविधानात्सूतं भस्मीकरोत्येव ॥” इति । लाघवादिगुणोपेतं अगुरुस्तेजाः वह्निस्थायी स्थिरोऽधूमः इत्युक्तगुणमिति यावत्। भा.टी.-कठूमर के दूध से हींग को सात भावना देकर इसकी दो मूषा बना लें । अब इस मूषा में कठूमर के दूध के साथ मर्दन किया हुआ पारद रख कर दूसरा मूषा से बन्द करके सन्धिलॅप कर दें । अब इस मूषागोलक को एक दूसरी मिट्टी की मूषा या सम्पुट में बंद करके वह्निमृत्स्ना से इसका संधिलॅप करके सुखा लें । फिर इसे लावक-कुक्कुट आदि लघु पुट में रखकर पुट दें । स्वांगशीत होने पर मूषा को निकालकर सावधानी से सन्धि को खोलकर भीतर मूषा में से काले अञ्जन के सदृश कृष्ण वर्ण की पारदभस्म को निकाल लें ॥३०-३३॥ अथ पारदमारणस्य ( अनुभूतः ) सप्तमः प्रकारः सूतं हिंगुलसम्भवं पलमितं तुल्यं बलिञ्चाहरेद् युक्त्या कज्जलिकां विधाय वटजक्षीरैस्ततः पेषयेत् । मृद्भाण्डे विनिधाय तत्र नत्रभूदण्डेन संचालितो मृद्वग्नौ दिनपाचितो रसवरो याति ध्रुवं भस्मताम् ॥३४॥ रसेश्वरं सुमसूण कृष्णाञ्जनसमप्रभम् । निर्धूमादिगुणोपेतं गृह्णीयाद् भस्मतां गतम् ॥३५॥