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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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१६० रसतरङ्गिणी तुल्यं पलमितमेव, बलिं गन्धकम्, नवभूर्वटपादपस्तस्यार्द्रदण्डेनेति भावः। अत्रादौ अत्यन्तमन्दाग्नि कार्पासशुष्कदंडादिकाष्ठैरग्निज्वालनीयो विधेयोऽन्यथ पारदनाश इत्यवधेयम् ॥ ३४-३५ ॥ भा.टी.-हिंगुलोत्थ पारद एक पल, शुद्ध गन्धक एक पल लेकर इनकी अच्छी तरह कज्जली बनाकर इसको वड़ के दूध से घोटकर एक मिट्टी के दृढ़ पात्र में डालकर चूल्हे में चढ़ा दें और इसके नीचे मन्द-मन्द अग्नि दें। मिट्टी के पात्र में पड़े हुए पारद को वड़ के एक हरे दण्डे से धीरे-धीरे चलाते रहें। इस तरह एक दिन तक अत्यन्त मन्द-मन्द अग्नि देकर पकाने से पारद की निश्चित भस्म हो जाती है। इस प्रकार से की गई भस्म काले अञ्जन के समान काली चमकीली होती है। इसमें निर्धूम, गौरव आदि गुण होते हैं ॥ ३४-३५ ॥ अथ मृतपारदस्य गुणाः ग्रहणीगजकर्षणदक्षतरं त्वतिसारहरं क्षयशोषहरम्। जठरानलमान्द्यविनाशकरं परिशीलय सूतभवं भसितम् ॥३६॥ प्रमदामदमर्दनगर्वधरं बलवीर्यविलाससमृद्धिकरम्। निजसेवक रक्षणदक्षतरं परिशीलय सूतभवं भसितम् ॥ ३७ ॥ क्षयं क्षीणनेत्रं क्षपयति च दीप्तिं वितनुते स्मृतिं सूते कामं द्रढयति च देहं द्रुततरम्। जरां वर्षेकेन त्वपनयति संशीलितमिदं गुणान् को वा वक्तुं प्रभवति रसेशस्य नियतम् ॥ ३८ ॥ रतिकेलिकलां भृशमुज्जवलयेल्ललितं ललनाकुलमाकुलयेत्। हृदि चोत्कलिकां कलयेत् कलितो रतिराघवतामयमेव सखा।३९॥ शृङ्गारस्य हि सर्वस्वं सुरतस्याधिदैवतम्। वशीकरणमन्त्रश्च प्रमदानां मृतो रसः॥४०॥ अथ गुणाः-भसितं भस्म, क्षीणं क्षेत्रं शरीरं यत्र एवम्भूतं क्षयं तदाख्यरोगं क्षपयतीति सम्बन्धः। उत्कलिकां उत्कंठां कामविषयाम्। स्पष्टमन्यत्॥३६-४०॥ भा.टी.-अच्छी तरह बनी हुई पारद की भस्म, ग्रहणी, अतीसार, क्षय, शोष रोग नष्ट करती है और पाचक अग्नि की दुर्बलता को दूर करती है। इस भस्म के सेवन करने से पुरुष यौवनमस्त स्त्री के मद को चूर करने का गर्व रख सकता है। इसके सेवन से शरीर में बल, वीर्य तथा आनन्द में वृद्धि होती है।