रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context१७२ रसतरङ्गिणी चाहिये । शरीर में केसर तथा कपूर का लेप नहीं करना चाहिये । दोपहर को तेज धूप में नहीं घूमना और व्यर्थ वाद-विवाद भी नहीं करना चाहिये ॥ ६३-६८ ॥ किन्हीं रस वैद्यों के विचार से तरबूज, करेला, कदलीफल, मकोय ( बरै ), ककोड़ा, पेठा तथा ककड़ी ये आठ द्रव्य ककाराष्टक में लिये जाते हैं। इनका पारद-सेवन करनेवाले को अच्छी तरह त्याग करना चाहिये ॥ ६६-१०० ॥ वक्तव्य—ककाराष्टक त्याग करनेके विषय में अन्यत्र यह कारण दिया है कि ककाराष्टक के सेवन से शरीर में से मलमूत्रादि के रूप में पारद का अधिक स्राव होता है जिससे पारद का प्रभाव अच्छी तरह शरीर में नहीं हो सकता है—"स्रवति न यथा रसेन्द्रो न च नश्यति जाठरो वह्निः” । अथ रसवैकृतौ सुखाचारः शिशिरसलिलसेकस्तापसन्तप्तकाये मलयजघनलेपश्चोत्तमांगे निकामम्। सुरभिहिमसमीरे मन्दमन्दप्रचारो हिमकरकरसंगः काव्यगाथाप्रसंगः ॥१०१॥ उरसि भवति तापे शीततोयावगाहो मनसि मलिनतायामासवारिष्टपानम् अनिशमिह तृषायां नारिकेलीयनीरं त्वपि हि झटिति सेव्यं शीतलं यच्च पथ्यम् ॥१०२॥ गुडूचिकोशीरकधान्यकानां मधुस्रवार्पटचन्दनानाम् । तुगासिताचूर्णयुतः कषायो रसोद्भवं तापगदं निहन्यात् ॥१०३॥ विद्रुमो रंगकं तुल्यमेतत् द्वयं रङ्गपादो न्मतं काञ्चनं मौक्तिकम् । वंशजातन्त्रिकासत्त्वयुक्तं समं भक्षयेद्वारिभिस्तत्र कूष्माण्डजैः॥१०४॥ रसविकारे चिकित्सामाह शिशिरेति—मलयजश्चन्दनम्, हिमकरकरसङ्गः चन्द्रकिरणसंपर्कः, मधुस्रवा = मधुयष्टिः, वंशजा = वंशलोचना, तन्त्रिकासत्त्वं गुडूचीसत्त्वम् ॥ १०१-१०४ ॥ भा.टी.—पारदभस्म या पारदयोगों के सेवनकाल में कुपथ्य होने पर शरीर में ताप की वृद्धि से शरीर बहुत गरम हो जाय तो रोगी के शिर में शीतल जल सिञ्चन करना चाहिये, साथ ही इसके बाद माथे में चन्दन का गाढ़ा लेप