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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 274 of 799

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Page 274

२३२ रसतरङ्गिणी दाडिमस्य दलञ्चैव तण्डुलीयकमेव च ॥ ६२ ॥ एरण्डमूलपत्राणि श्योनाको वस्त्ररञ्जनी । पालङ्कया भद्रमुस्ता च मीनाक्षी कोकिलाक्षकः ॥६३॥ पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयमभ्रस्य मारको गणः । यथारोगं यथालाभं भेषजैः पुटयेद् घनम् ॥६४॥ अथाभ्रकमारकगणः—बिल्वमूलं बिल्वदलञ्चेत्युभयम् । वृषः वासकः, श्रीपर्णी गम्भारी, मातुलानी भङ्गा, तिक्तका कटुकी, घोट्टा बदरी, वस्त्ररञ्जनी मञ्जिष्ठा । स्पष्टमन्यत् ॥५६-६४॥ भा.टी.—आक का दूध, बड़ का दूध, थोहर का दूध, मकोय, मोथा, कुमारी, बड़ की कोंपल ( अंकुर ), गोमूत्र, बेल की जड़ और पत्तो, अडूसा, त्रिफला, बकरी का रक्त, छोटी कटैली, कदम्ब, अरणि, शालपर्णी, गंभारी, पाढल, गुड़, तिलपर्णी, पृश्निपर्णी, गोखरू, अपामार्ग, सफेद सरसों, लोध, बड़ी कटैली, हुलहुल, धतूरा, कसौंदी, भांग, गिलोय, मरचा, तुलसी, दूब, अस- गन्ध, कुटकी, ब्राह्मी, मैनफल, तगर, शंखपुष्पी, पान, बेर, सफेदपुनर्नवा, मूसा- कानी, सप्तपर्ण, कदलीकन्द, भांगरा, देवदारु, मूसली, चमेली, अगस्त का पत्र, तालीशपत्र, चित्रक, दाड़िमफलछाल, चौलाई, एरण्ड की जड़ तथा पत्तो, अरलु, मंजीठ, नागरमोथा, मछेछी, तालमखाना, इन औषधियों के समुदाय को पूर्वाचार्यों ने अभ्रकमारकगण नाम से कहा है । इनमें से जिस-जिस रोग को जो-जो औषधियाँ नष्ट करती हैं आवश्यकतानुसार उनसे अभ्रक को घोट कर पुट देनी चाहिये । यदि गणोक्त सब औषधियाँ न मिल सकें तो जितनी मिलें उन्हीं से पुट देने चाहिये ॥ ५६–६४ ॥ अभ्रकभस्मनो लोहितीकरणम् गाङ्गेरुकी भद्रमुस्ता वटक्षीरन्तथैव च । वटमूलजलं वापि हरिद्राया द्रवस्तथा ॥ ६५ ॥ समङ्गाकथितञ्चैव घनमेभिः सुपेषयेत् । पुटद्वयं त्रयं वापि वितरेद्भिषजां वरः ॥ ६६ ॥ निश्चन्द्रिकञ्च मृदुलं रक्तात्पलसमप्रभम् । गगनस्य भवेद्भस्म ततः कार्येषु योजयेत् ॥ ६७ ॥ गाङ्गेरुकी नागबला । समङ्गा मञ्जिष्ठा ॥ ६५–६७ ॥ भा.टी.—अभ्रक मारक औषधियों के साथ पुट देने पर यदि अभ्रक की