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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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चतुर्दशस्तरङ्गः ३२५ इत्थं बस्तिप्रयोगेण दिनसप्तकमात्रकम् । श्वेतप्रदरजा बाधा चिरजापि विनश्यति ॥ ११९ ॥ सुभगाम्लद्रवोऽयन्तु योजितः कर्णधावने । सान्द्रं व्रणं तु चिरजं कर्णस्रावञ्च नाशयेत् ॥ १२० ॥ उक्तमानकृतेनैव टंकणाम्लद्रवेण तु । नासाप्रक्षालनाद्युक्त्या पीनसात्परिमुच्यते ॥ १२१ ॥ भागिकष्टङ्कणाम्लस्तु जलञ्च शतभागिकम् । लिंगे बस्तिप्रयोगेण बस्तिशोथं व्यपोहति ॥ १२२ ॥ टङ्कणाम्लद्रवः । क्षालने नेत्रयोः—उद्धतं प्रबलम् ॥ ११७–१२२ ॥ इति क्षारत्रिकविज्ञानीयो नाम त्रयोदशस्तरङ्गः भा.टी.—उक्त प्रकार से बनाया हुआ टंकणाम्ल द्रव यदि प्रतिदिन नेत्रा- भिष्यन्द में नेत्रों को धोने के काम में लाया जाय तो इससे नेत्रपलकों की शोथ, पीव बहना आदि में आराम आता है । एक भाग टंकणाम्ल में चार सौ अस्सी भाग परिश्रुत जल डालकर बनाये हुए टंकणाम्ल द्रव से सात दिन तक योनि में उत्तरबस्ति देने से बहुत पुराने श्वेतप्रदर में भी आराम आता है । इसी द्रव से कर्णस्राव या कर्णव्रण को धोने से आराम आता है । इसी विधि से बनाये टंकणाम्ल द्रव से भीतरी शोथयुक्त नासिका को धोने से पीनस ( जुकाम ) में आराम आता है । एक भाग टंकणाम्ल में सौ भाग शुद्ध जल डालकर बनाये हुए १ प्रतिशत द्रव से मूत्रेन्द्रिय में उत्तरबस्ति देने से बस्ति में शीघ्र आराम आता है ॥ ११७–१२२ ॥ यह क्षारत्रिकविज्ञानीय नामक त्रयोदशतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ क्षारविशेषादिविज्ञानीयचतुर्दशस्तरङ्गः । अथ नवसारस्य नामानि नवसारो नव्यसारस्तथैव नवसादरः । नृसादरो नृसारश्च नरसारश्च कीर्तितः ॥ १ ॥ किट्टक्षारो निगदितस्तथैव नरसादरः । चूलिकालवणं ख्यातं चुल्लिकालवणञ्च तत् ॥ २ ॥ तत्रादौ नवसादरः—नामान्यस्य तन्त्रे व्यवहार्याणि ॥ १–२ ॥ भा.टी.—नवसार, नव्यसार, नवसादर, नृसादर, नृसार, नरसार, किट्टक्षार,