रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextचतुर्दशस्तरङ्गः ३२७ वृश्चिकोत्थविषघ्नश्च लोहद्रावणकस्तथा । हृदामयहरो नेत्र्यः श्वित्रकुष्ठहरस्तथा ॥ ७ ॥ वृश्चिकोत्थविषघ्नः लेपाद् । स्पष्टमन्यत् ॥ ५-७ ॥ आ.टी.—नौसादर त्रिदोषप्रकोपहर विशेषतः श्लेष्माधिक त्रिदोषप्रकोपहर है । गुणों में यह स्निग्ध (स्निग्धता उत्पन्न करनेवाला अथवा स्पर्श में स्निग्ध) सूक्ष्म अणु स्रोत में प्रविष्ट होनेवाला अथवा वायु में मिश्रित होकर क्रिया करने- वाला है जैसे नवसादर के सुँघाने से मूर्च्छा दूर होती है। लघु (शीघ्र ही पचने- वाला ), पाचक (आंतों के लिये उत्तेजक होने से पाचक रसोत्पादक), सारक ( यकृत् के पित्तसंचय को हटाकर आंतों की प्रेरक गति को बढ़ानेवाला ), तीक्ष्ण (स्थानिक श्लैष्मिक कला का उत्तेजक ), आमाशयादि अंगों के लिये उत्तेजक होने से जाठराग्निदीपक है । यह वीर्य में उष्ण, प्लीहरोगनिवारक, आममांस या मांस के अजीर्ण में लाभदायक है । वातकफात्मक गुल्म तथा आध्मान ( अफारा ) शामक है । यह श्वाससंस्थान को उत्तेजित करके उसमें चिपके हुए श्लेष्मा को पतला करके निकाल देता है । अतः यह कफ-विश्लेषक या संसक है । बिच्छू के विष को नष्ट करता है और धातुओं को पिघलाने में काम आता है । नवसादर सर्वाङ्ग या हृदय के लिये उत्तेजक होने से हृदय की दुर्बलता, अजीर्णरोगादि से विकृति तथा हृदय की गति के अवरोध में लाभ- दायक होने से हृदयरोगहर है । नेत्रों में प्रयोग करने से उनके श्लैष्मिक रोगों को मिटाता है, अतः नेत्र्य है और सफेद कोढ़ के दागों पर इसको लगाने से वे मिट जाते हैं, अतः श्वित्रकुष्ठहर होता है ॥ ५-७ ॥ नवसादरस्य मात्रा द्विगुंजतश्चाष्टगुंजामितं तु नवसादरम् । प्राणाचार्यः प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ८ ॥ मात्रास्य भक्षणयोग्या देशकालानुसारं परिणमते ॥ ८ ॥ आ.टी.—अन्तःप्रयोग के लिये नौसादर की मात्रा बल काल आदि का विचार कर दो रत्ती से आठ रत्ती तक दी जाती हैं ॥ ८ ॥ नवसादरस्य आमयिकः प्रयोगः जरणात्र्यूषणोपेतो नरसारो विशोधितः । दिनसप्तकमात्रेण जाठराग्निप्रदीपनः ॥ ६ ॥ रामठत्र्यूषणोपेतो नरसारो विशोधितः ।