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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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चतुर्दशस्तरङ्गः ३३१ भा.टी.—सोरक, सोरा, सोरका, सूर्यक्षार, मृत्क्षार, वह्निक्षार, ये सब नाम सोरे के कहे जाते हैं ॥ २७ ॥ वक्तव्य—साधारणतः सोरा दो प्रकार का होता है १—सोरा, ६—कलमी सोरा, इनमें सोरा अशुद्ध अवस्था में और कलमी सोरा शुद्ध अवस्था (मिट्टी से पृथक् कर स्फटिक बना लेना) में कहा जाता है । यह नैसर्गिक रूप से मिट्टी में मिला हुआ पाया जाता है । इस मिट्टी को खुरच कर मिट्टी और राख के बने हुए चबूतरे के ऊपर बिछा देते हैं । वारिष होने पर वर्षा जल के साथ सोरा छन कर नीचे आ जाता है और नीचे तक बनी हुई क्यारियों में फैल जाता है । फिर इसको क्यारियों से खुरच कर लोहे के बड़े कड़ाहों में जल के साथ उबाला जाता है । अब इस उबले हुए जल को छोटे-छोटे पात्रों में भर कर ठंडा करने के लिए रख दिया जाता है जिससे सोरे के स्फटिक नीचे जम जाते हैं । इन मटियाले से सोरे के स्फटिकों को जल से धोकर स्वच्छ कर लेते हैं तो यही कलमी सोरा कहा जाता है। इसके स्फटिक श्वेतवर्ण लम्बे और षट्कोण होते हैं । स्वाद में शीत लवणरस के सदृश चतु- र्गुणशीत जल और बीसगुने गरम जल में घुल जाते हैं । सोरकस्य गुणाः सोरकः कटुकस्तीक्ष्णो विशेषाल्लवणः सरः । वह्निप्रदीपकोऽत्युष्णस्त्वाग्नेयास्त्राथसिद्धिकृत् ॥२८॥ अथ सोरकः—अत्युष्ण इति वीर्यतः, स्पर्शतस्तु शीत एव, अंजनादौ प्रक्षेपात् ॥ २८ ॥ भा.टी.—सोरा कटुरस, तेज (लगनेवाला), विशेष रूप से लवण रस होता है। अन्ततःप्रयोग में यह अग्निवर्द्धक और वीर्य में उष्ण, स्पर्श में शीत है। इसके द्वारा आग्नेयास्त्र के कर्म (बन्दूक) अर्थात् बारूद, कारतूस आदि का निर्माण होता है ॥ २८ ॥ सोरकस्य निर्मलीकरणम् पलोन्मितं सोरकन्तु शीतले सलिले भिषक् । चतुष्पलमिते क्षिप्त्वा वस्त्रपूतं पचेत्ततः ॥ २६ ॥ स्वल्पशेषं जलं ज्ञात्वा पात्रमुत्तारयेत्ततः । विमलं चूर्णसङ्काशं सोरकन्तु समाहरेत् ॥ ३० ॥