रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
Page 358 of 799
Read in context३३२ रसतरङ्गिणी स्वल्पशेषेऽपि सलिले यदि वह्निः प्रदीयते । जले निःशेषतां याते सोरकं दह्यते स्वयम् ॥ ३१ ॥ तस्माद्रसायनाचार्यः सावधानतया सदा । सोरकं निर्मलीकुर्यान्न स्याद् द्रव्यक्षतिर्यथा ॥ ३२ ॥ निर्मलीकरणं प्रयोगयोग्यतासम्पादनाय सोरकं सुपूतं कृत्वा अत्युष्णे जले द्रावयित्वा वस्त्रपूतं विधाय शोषयेदित्यर्थः ॥ २६-३२ ॥ भा.टी.—एक पल अर्थात् आठ तोले सोरे को बत्तीस तोले शीतल जल में डालकर घोल लें । घुलने के बाद इसको कपड़े में छान लें । अब छने हुए जल को पात्र में भरकर अग्नि पर रखकर पकायें । जब बहुत थोड़ा सा जल शेष रह जाय तो इसे उतारकर नीचे स्फटिक बनाने के लिये रख दें । शीतल होने के बाद जमे हुए सोरे को निकाल लें । यदि थोड़ा जल शेष रहने पर भी अग्नि दी जाय तो पानी के सूखने पर सांरा जल जाता है । अतः रसायना- चार्य को बड़ी सावधानी से सोरे को स्वच्छ करना चाहिये जिससे हानि भी न हो, कार्य भी ठीक-ठीक हो जाय ॥ २६-३२ ॥ सोरकस्य सुकरं निर्मलीकरणम् अत्युष्णं सलिलं स्वच्छं सोरकस्यार्द्धभागिकम् । आदाय विमले पात्रे निक्षिपेत्तु भिषग्वरः ॥ ३३ ॥ निक्षिप्य सोरकं वस्त्रपूतञ्च शीततां नयेत् । शलाकाकारतां यातं सोरकं तु समाहरेत् ॥ ३४ ॥ भा.टी.—एक भाग सोरे में आधा भाग बहुत तेज गरम जल डालकर जब वह अच्छी तरह से घुल जाय तो उसे कपड़े में छानकर साफ कर लें, अब छने हुए जल को एक पात्र में डालकर ठंडा होने के लिये रख लें, जल के ठंढा होने पर शलाकाकार ( सलाई के जैसे ) लम्बे सोरक के स्फटिकों को सुखाकर रख लें ॥ ३३-३४ ॥ अथ सोरकस्य शोधनम् सोरकं चूर्णितं खल्वे त्वेलातोयेन भावयेत् । त्रिंवारं भावनादेव शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ ३५ ॥ भा.टी.—उक्त प्रकार से प्राप्त सोरे के स्फटिकों को खरल में चूर्ण करके इसमें छोटी इलायची का जल डालकर भावना दें, जब सूख जाय तो पुनः