रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextचतुर्दशस्तरङ्गः ३४३ सेवन करने पर वृक्कशूल शीघ्र नष्ट हो जाता है । तिलक्षार को जवाखार तथा कदलीक्षार में मिला शहद से कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से शीघ्र ही अश्मरी गलकर निकल जाती है । एक मासा तिलक्षार और एक मासा विडनमक दोनों को एकत्र करके तक्रानुपान या मधु सहपान से सेवन करने पर अश्मरी नष्ट होती है । तिलक्षार को आंवलाक्षार में मिला कर गोखुरुकषाय अनुपान से सेवन करने से मूत्र में आनेवाली शर्करा बन्द हो जाती है । तिलक्षार को जवाखार में मिलाकर जल से व्रणशोथ पर लेप करने से शीघ्र ही वह फट जाता है । यदि मांस अधिक खाने से अजीर्ण हो गया हो तो एक मासा मात्रा में तिलक्षार को जल से अथवा सहंजने के स्वरस से खिलाने पर वह अजीर्ण नष्ट हो जाता है । सरपोंका के क्षार में तिलक्षार एक मासा मात्रा में मिला गरम जल अथवा गुल्महर द्रव्यों के कषाय से सेवन करने पर गुल्मरोग शीघ्र ही समूल नष्ट हो जाता है ॥ ८२-६० ॥ अथ स्नुहीक्षारस्य नामानि स्नुहिक्षारः स्नुहीक्षारः स्नुक्क्षारश्च तथा मतः । वज्रक्षारोऽथ सेहुण्डक्षारश्च परिकीर्तितः ॥ ६१ ॥ भा.टी.—स्नुहिक्षार, स्नुहीक्षार, स्नुक्क्षार, वज्रक्षार, सेहुण्डक्षार, ये सब नाम सेहुड़ क्षार के कहे जाते हैं ॥ ६१ ॥ अस्य गुणाः स्नुहीक्षारः स्मृतस्तीक्ष्णः सर्वोदरविनाशनः । गुल्मप्रशमनो वह्निदीपनः शोफनाशनः ॥ ६२ ॥ विषूचिकाहरोऽजीर्णनाशनः शूलसूदनः । यकृद्दाषप्रशमनः श्वासातङ्कप्रभञ्जनः ॥ ६३ ॥ भा.टी.—सेहुड़ का क्षार तीक्ष्ण और सब उदररोगनाशक है । इसके प्रयोग से गुल्म शान्त होता है,अग्नि दीप्त होती है और यकृत् अथवा जलोदर के कारण होनेवाला शोथ नष्ट होता है । विसूचिका, अजीर्ण तथा उदरशूल को नष्ट करता है, यकृत्दोष को मिटाता है और श्वास रोग को समूल नष्ट करता है ॥ ६२,६३ ॥ अस्य ग्रामयिकः प्रयोगः स्नुहिक्षारः शङ्खभूतिः सर्जिका यवजान्वितः । विषूचिकां निहन्त्याशु त्वजीर्णञ्चातिदारुणम् ॥ ६४ ॥ चिरोत्थितानां गुल्मानां पञ्चानां पञ्चतां नयेत् । ग्रहणीं नाशयेदाशु तथा शूलञ्च दारुणम् ॥ ६५ ॥