रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context३४४ रसतरङ्गिणी स्नुहिक्षारस्त्रिलवणः क्षारत्रिकसमन्वितः । निहन्ति शोफप्लीहानमुदराणि च नाशयेत् ॥ ६६ ॥ सत्र्यूषणः स्नुहीक्षारो मधुना परिशीलितः । नाशयेदचिरादेव श्वासं परमदारुणम् ॥ ६७ ॥ स्नुहीक्षारो वरोपेतः सैन्धवाग्निसमन्वितः । निहन्ति वह्निमान्द्यं तु यकृत्प्लीहोदराणि च ॥ ६८ ॥ स्नुहीक्षारो विशेषात् शोकोदरहरः । शङ्खभूतिः शङ्खभस्म । गुल्मानां पञ्चानां पञ्चविधानां गुल्मानां पञ्चतां विनाशमित्यर्थः । वरा त्रिफला ॥ ६४-६८ ॥ भा.टी.—सेहुड़ का क्षार, शंखभस्म, सज्जीखार तथा जवाखार को मिला प्रयोग करने से विसूचिका तथा अतिभयंकर अजीर्ण में शीघ्र आराम आता है। इसी योग से पाँचों प्रकार के पुराने गुल्म, ग्रहणी रोग तथा भयंकर उदरशूल शीघ्र ही शान्त होते हैं। सेहुड़क्षार में सैन्धानमक, सौंचरनमक तथा विडनमक जवाखार, सज्जीखार और टंकणक्षार मिलाकर कुछ काल सेवन करने से शोथ, प्लीहावृद्धि तथा उदररोग नष्ट हो जाते हैं। सेहुड़ के क्षार को सोंठ, मिर्च, तथा पिप्पलीचूर्ण में मिलाकर शहद से चाटने से कुछ समय में भयंकर श्वास रोग नष्ट हो जाता है। सेहुड़ के क्षार में त्रिफलाचूर्ण, सैन्धानमक तथा चित्रक- मूलचूर्ण मिलाकर सेवन करने से अग्निमान्द्य, यकृत् तथा प्लीहा रोगों में आराम आता है ॥ ६४-६८ ॥ अथ पलाशक्षारस्य नामानि पलाशक्षारकश्चैव किंशुकक्षारकस्तथा । पर्णक्षारश्च कथितस्त्रिपर्णक्षारकस्तथा ॥ ९६ ॥ भा.टी.—पलाशक्षार, किंशुकक्षार, पर्णक्षार और त्रिपर्णक्षार, ये सब नाम पलाश (ढाक) क्षार के कहे जाते हैं ॥ ६६ ॥ अस्य गुणाः पर्णक्षारोऽग्निजननो गुल्मप्लीहादिनाशनः । यकृद्वृद्धिप्रशमनो मूत्रकृच्छ्राश्मरीहरः ॥ १०० ॥ पलाशक्षारो गुल्मघ्नी शुक्रशोधनश्चापि ॥ १०० ॥ भा.टी.—पलाश क्षार सेवन करने पर क्षुधावृद्धि करता है और गुल्म, प्लीहा आदि रोगों को नष्ट करता है। इसके प्रयोग से यकृत्वृद्धि दूर हो जाती है और मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरी रोग भी नष्ट हो जाते हैं ॥ १०० ॥